पश्चिमी टुंडी के जामकोल निवासी रसिकलाल ने पुत्र धर्म का निर्वहन कर गुरु जी के दशकर्म की रस्में निभाईं

- टुण्डी
दिशोम गुरु शिबू सोरेन की कर्मभूमि टुण्डी आज़ किसी परिचय का मोहताज नहीं उनके द्वारा चलाए गए महाजनी प्रथा के खिलाफ अभियान आज़ भी लोगों को दिलों में जिंदा है। उनके द्वारा किए गए कठिन संघर्षों को आदिवासी भाई बहनों आज़ भी याद रखने का काम किया है गुरु जी द्वारा महाजनों के शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने एवं आदिवासियों को उनके हक दिलाने में अहम् भूमिका की चर्चा लोग आज़ भी करते हैं उनके कामों के कारण आदिवासी उन्हें आज़ भी भगवान मानकर पूजते हैं एवं गुणगान करते नहीं थकते। उनकी आत्मविश्वास से लबरेज आदिवासी भाई बहनें उनकी असामायिक निधन से काफ़ी मर्माहत एवं दुःखी महसूस कर रहे हैं इसका जीता-जागता उदाहरण तब देखने को मिला जब पश्चिमी टुंडी के जामकोल निवासी रसिकलाल सोरेन ने आज़ शुक्रवार को उनके दशकर्म पर मुंडन संस्कार कर आदिवासी परंपरा के तहत पूरे विधि-विधान के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की गई और उनके द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए बड़ों से लेकर बच्चे भी उनके दशकर्म पर भाग लेकर एक मिशाल कायम किया।

जामकोल निवासी रसिकलाल सोरेन पिता दुर्गा सोरेन ने गुरू जी की जीवनी की कुछ पुरानी यादें मीडिया के समक्ष साझा करते हुए कहा कि गुरु जी आंदोलन के दौरान रात्रि विश्राम जामकोल गांव में ही करते थे और लोगों को मेहनत मजदूरी कर अपना जीवन यापन करने की सीख देते थे एवं शोषण करने के खिलाफ आवाज बुलंद करने की नारा देते हुए लोगों को उनके सही हक दिलाने के पक्षधर थे। आज़ के दशकर्म कार्यक्रम में मुख्य रूप से रसिकलाल सोरेन, उनके पिता दुर्गा सोरेन ,भाई मुन्नीलाल सोरेन,चरण सोरेन मांझी हडा़म सुकराम बास्की, नाईकी हडा़म रामलाल बास्की,योग मांझी मुंशु सोरेन, मोतीलाल बास्की, सर्वश्री किष्टो मुर्मू, तिवारी हेंब्रम , तिवारी मुर्मू समेत बड़ी संख्या में आदिवासी भाई बहनें उपस्थित थे।

















