ऋषिबोधोत्सव (महाशिवरात्रि) सच्चे शिव की खोज का संकल्प दिवस

[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]प्रस्तोता- घेवरचन्द आर्य पाली[/box]
[tmm name
समस्त सनातन हिन्दू समाज जिस पर्व को ‘महाशिवरात्रि’ के रूप में मनाता है वही हम सभी वैदिक धर्मी आर्यो के लिए “‘ऋषि बोध दिवस'” पर्व हैं। जो लोग आर्य समाज से गम्भीरता व दृढ़ता के साथ जुडे है वे तो जानते ही हैं कि १४ वर्ष के बालक “मूल शंकर” ने शिवरात्रि का व्रत पूरी श्रद्धा व आस्था से रखा था। और शिव दर्शन की दृढ़ अभिलाषा से पूरी रात्रि आंखों पर जल के छिपे देकर जागे थे।
शिव तो दर्शन देने नहीं आये अपितु एक चूहा शिव के लिए लगाये गए भोगों को खाने के लिए आ गया और शिवलिंग पर ही मल मूत्र करने लगा, इस दृश्य को देखकर बालक मूल शंकर के मन मस्तिष्क में एक प्रश्न उपस्थित होता है कि- क्या ये वही सच्चे शिव है जिनको सर्व रक्षक देवाधिदेव महादेव कहा जाता है? ये सामान्य सी घटना कितने ही मनुष्यों ने उससे पूर्व भी देखी होंगी? और आगे भी देखेंगे परन्तु दयानन्द की तरह हमारे मन में यह प्रश्न क्यों नहीं उठता है ?

मेरा मानना है कि किसी भी प्रचलित परम्परा अथवा निराधार कुरीति के विषय में इस प्रकार के प्रश्न ऐसे ही उत्पन्न नहीं हो जाते, ये तो पूर्व जन्मों में अर्जित ज्ञान व तप के संस्कार और पूण्य का परिणाम होता है। ऐसा ही हुआ उस महान आत्मा बालक मूल शंकर के साथ जो पूर्व जन्मों में ऋषि जन्मों को धारण किये चला आ रहा था।
इसलिए परमात्मा ने ऋषिवर के हृदय में इसी दिन ज्ञान की अग्नि जागरूक की । परिणाम स्वरूप उस दिव्य महान आत्मा ने मानव मात्र के कल्याण व प्राणिमात्र के हित के लिए उस प्रश्न के समाधान का बीज उसी दिन बो दिया। बालक मूल शंकर ने संकल्प लिया कि “सच्चे शिव की खोज ही मेरे जीवन का उद्देश्य रहेगा। ये पाषाण की आकृति मात्र सच्चे शिव नहीं हो सकते”
यह विचार आने पर 14 वर्ष के बालक मूलशंकर ने पिता को जगाकर पूछा पिताजी यह क्या हैं? आपने जिस शिव का उल्लेख किया है वह शिव यह पाषाण मूर्ति नहीं हो सकती। पिताजी क्या कहते उन्होंने बालक मूल शंकर को घर भेज दिया। उस रात्रि घर जाकर मां से मांगकर भोजन भी किया यानी उन्होंने यह परम्परागत ‘व्रत’ तोड़ दिया और उसके स्थान पर सच्चे शिव की खोज में स्वजीवन अर्पण का व्रत धारण करने का संकल्प लेकर हम जैसे करोडों जिज्ञासुओं के लिए वेद ज्ञान रूपी गंगा का आर्य भाषा हिन्दी में प्रवाहित करके वेद वर्णित सच्चे शिव का विराट स्वरुप हमारे सामने प्रस्तुत किया।
आइये हम सब मिलकर वेदों, ऋषियों के ग्रंथों, दर्शनों, उपनिषदों, स्मृतियों, वाल्मीकि रामायण व महाभारत आदि वैदिक ग्रंथों के स्वाध्याय मनन का संकल्प लेकर अपने और समाज के अज्ञान व अन्धकार को नष्ट करने का प्रयास करें। जीवन में सच्चा प्रकाश प्राप्त करने के लिए सत्यार्थ प्रकाश व संस्कार विधि के स्वाध्याय को अपनी दिनचर्या बनाएं।
आप कितने समय से आर्य वीर दल में आ रहे हैं। आर्य समाज और आर्य वीर दल के ग्रुपों से भी जुड़े हुए हैं लेकिन कितने आर्य वीर है जिनके हृदय में ऋषिवर दयानन्द और उसके द्वारा स्थापित आर्य समाज और उसकी युवा शाखा आर्य वीर दल के प्रति श्रद्धा और सम्पर्ण का भाव है?
आज ऋषि बोधोत्सव को हम सब आर्य वीर संकल्प लें पहले हम खुद वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करके ऋषि भक्त और आर्य समाजी बने उसके बाद अपना कुछ समय समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने के लिए जागरण में लगाएं, और अपने संपर्क में आने वाले भाई बहिनों को अन्धकार से निकालकर वेदों के प्रकाश तक पहुंचाये । तभी हमारा यह बोध रात्रि पर्व मनाना सार्थक होगा। शिवरात्रि का वेद मंत्र
ओ३म् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।। ( यजुर्वेद अ० १६। म० ४१।।)
जो सुखस्वरूप संसार के उत्तम सुखों का देव्ने वाला कल्याण का कर्ता , मोक्षस्वरूप , धर्मयुक्त कामों का ही करनेवाला अपने भक्तों का सुख देनेवाला और धर्मयुक्त कामों में युक्त करनेवाला , अत्यंत मंगलस्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष का सुख देनेवाला है उस सच्चिदानंद स्वरुप निराकार सर्व शक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मे अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्वेश्वर सर्व व्यापक सर्वान्तर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता परमपिता परमात्मा को हमारा बारम्बार नमस्कार
ओ३म् अन्यदेवाहुर्विविद्यायाऽअन्यदाहुरविद्याया:।इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तिद्विचचक्षिरे। ( यजुर्वेद ४०|१३ )
भावार्थ :- ज्ञान आदि गुण से युक्त चेतन से जो उपयोग किया जा सकता है, वह अज्ञानयुक्त जड़ वस्तु से नहीं। और जो जड़ वस्तु से प्रयोजन सिद्ध होता है, वह चेतन से नहीं हो सकता। ऐसा सब मनुष्यों को विद्वानों के संग्, विज्ञान, योग और धर्माचरण से इन दोनों का विवेचन करके, जड़ और चेतन दोनों का ठीक- ठाक उपयोग करना चाहिए।







