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कला से जीवन निर्माण: टुण्डी के कृष्णा ठाकुर बने मूर्तिकला में आत्मनिर्भरता की मिसाल

DEEPAK KUMAR PANDEY
Correspondent Dhanbad

DEEPAK KUMAR PANDEY Correspondent - Dhanbad (Jharkhand)

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विशेष कला समाचार

विद्या, ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा निर्माण में निपुण कृष्णा ठाकुर की कला बनी टुण्डी की पहचान

📍 टुण्डी
📅 19 जनवरी
✍️ दीपक पाण्डेय
विद्या, ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की प्रतिमाओं के निर्माण में अपनी बेजोड़ कला से पहचान बना चुके टुण्डी प्रखंड के लछुरायडीह गांव निवासी 37 वर्षीय कृष्णा ठाकुर की मूर्तियों के लिए लोगों को पूरे महीने भर इंतजार करना पड़ता है। कृष्णा ठाकुर बीते लगातार आठ वर्षों से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाकर न केवल अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि इसी कला के बल पर अपने परिवार का सम्मानजनक भरण-पोषण भी कर रहे हैं।
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मीडिया से बातचीत के दौरान कृष्णा ठाकुर ने अपनी कला यात्रा के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि वह पिछले आठ वर्षों से निरंतर प्रतिमा निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं और आज एक अच्छा व संतोषजनक जीवन जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्य से उन्हें किसी भी प्रकार की आर्थिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता और वे पूरी आत्मनिर्भरता के साथ अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं।

कृष्णा ठाकुर ने बताया कि देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित करते समय उन्हें आत्मिक खुशी और संतोष की अनुभूति होती है। विभिन्न पर्व-त्योहारों में वे अलग-अलग स्वरूपों की प्रतिमाओं का निर्माण कर लोगों को बेहतर सेवा देने का प्रयास करते हैं। पिछले आठ वर्षों से उनके द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं से लोग काफी संतुष्ट हैं, जिस कारण हर वर्ष उनकी प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
“देवी-देवताओं की प्रतिमा बनाना मेरे लिए केवल काम नहीं, बल्कि साधना है।”
उन्होंने आगे बताया कि यह कला उन्होंने अपने गुरु से दीक्षा लेकर सीखी थी और आज उसी कला के सहारे एक अच्छे व्यवसाय से जुड़कर अपने बच्चों का संतोषप्रद भविष्य संवार रहे हैं। वर्तमान समय में उनके पास कुल 55 प्रतिमाएं तैयार हैं, जबकि मांग लगभग 150 प्रतिमाओं की है। समय की कमी के बावजूद वे पूरी मेहनत और लगन से अपने लक्ष्य को पूरा करने में जुटे हुए हैं।

कृष्णा ठाकुर ने यह भी कहा कि वह कभी बेकार नहीं बैठते और हर त्योहार के दौरान उनके पास ग्राहकों की संख्या अन्य मूर्तिकारों की तुलना में कहीं अधिक रहती है। इस व्यवसाय से उन्हें आर्थिक मजबूती के साथ-साथ सामाजिक सम्मान और आत्मिक संतोष भी प्राप्त हुआ है।

© स्थानीय कला एवं संस्कृति विशेष रिपोर्ट
कला • मूर्तिकला • आत्मनिर्भर भारत

 

न्यूज़ डेस्क

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