जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण – जन्म, लीलाएं, उपदेश और महिमा

लेखक: श्रीमती कृतिका खत्री, सनातन संस्था, दिल्ली
भारतीय संस्कृति के इतिहास में भगवान श्रीकृष्ण का स्थान अद्वितीय है। वे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व या धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि धर्म, नीति, प्रेम और करुणा के सजीव स्वरूप हैं। उनकी लीलाएं, उपदेश और व्यक्तित्व मानव जीवन के हर पहलू को छूते हैं।
श्रीकृष्ण का जीवन एक ऐसा पूर्ण जीवन-दर्शन है, जिसमें युद्धभूमि के रणवीर, ग्वालों के साथी, भक्तों के सखा और ज्ञान के मार्गदर्शक – सभी रूप एक साथ मिलते हैं। चाहे वह माखन चुराने वाला बालक हो या अर्जुन को धर्म का उपदेश देने वाला योगेश्वर, हर रूप में वे हमें सत्य, धर्म और निस्वार्थ कर्म का संदेश देते हैं।
उनका जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। इसी कारण भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी का दिन कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, जब हर घर, हर मंदिर और हर भक्त का हृदय कृष्णमय हो जाता है।
कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व
कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है, जब भगवान विष्णु ने धरती पर भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। यह पावन घटना मध्यरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में घटित हुई।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्रीकृष्ण का तत्त्व सामान्य दिनों की तुलना में 1000 गुना अधिक सक्रिय रहता है। इसीलिए इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप, पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन करने से भक्तों को अत्यधिक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
पूजा विधि और उपासना का महत्व
- रात्रि को जन्माष्टमी के समय भगवान कृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र का विधिवत पूजन करें।
- दीप जलाकर आरती करें और भोग लगाएं।
- पूजन के बाद कुछ समय तक भावपूर्वक कृष्ण नामजप करें – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
- कलियुग में निरंतर नामजप को सर्वोत्तम साधना माना गया है, क्योंकि इससे भक्त देवता के तत्त्व का लाभ निरंतर प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण का दिव्य अवतार
यशोदा को विश्वरूप दर्शन
एक दिन जब गोपों ने शिकायत की कि कृष्ण ने मिट्टी खा ली है, तब यशोदा ने उन्हें मुंह खोलने को कहा। जैसे ही श्रीकृष्ण ने मुंह खोला, यशोदा को उनके मुख में सम्पूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन हुआ। यह सिद्ध करता है कि भगवान का कार्य बाल्यकाल से ही प्रारंभ हो जाता है।
रासलीला – ब्रह्मानंद की अनुभूति
शरद ऋतु की चांदनी रात में श्रीकृष्ण ने गोकुल में गोपियों के साथ रासलीला रचाई। यह कोई भौतिक घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव था, जिसमें गोपियों ने ब्रह्मानंद का आस्वादन किया।
श्रीकृष्ण की अद्वितीय लीलाएं
- जरासंध ने श्रीकृष्ण को पकड़ने के लिए अठारह बार मथुरा पर आक्रमण किया, किंतु असफल रहा।
- कंस ने 280 हाथियों को यमुना पार कर मथुरा घेरा, लेकिन तीन माह के घेरे के बाद भी कृष्ण का पता न लगा सका।
- श्रीकृष्ण प्रतिदिन अलग-अलग घर में रहते और गोकुल के एक हजार बालक भी उनके समान वेश (मोरपंख) धारण करते, जिससे उनकी पहचान संभव न हो पाई।
ये घटनाएं प्रमाण हैं कि श्रीकृष्ण केवल मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात् अवतार थे।
गीता का तत्त्वज्ञान और श्रीकृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण का अद्वितीय योगदान श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में है। इसमें उन्होंने जीवन के दो मार्ग –
- प्रवृत्ति मार्ग (संसार में कर्म करते हुए धर्मपालन)
- निवृत्ति मार्ग (आध्यात्मिक मुक्ति की ओर गमन)
का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया।
गीता में मुख्य उपदेश
- कर्तव्य का पालन फल की इच्छा से मुक्त होकर करना चाहिए।
- धर्म का संरक्षण ही जीवन का उद्देश्य है।
- प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन जीवन में शांति और सफलता लाता है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में यही शिक्षा दी कि सही मार्ग पर डटकर, बिना स्वार्थ के, धर्म के लिए कार्य करना ही सच्चा योग है।
रासलीला पर लगने वाले आरोप और उनका खंडन
कुछ धर्मविरोधी लोग रासलीला को भौतिक वासना से जोड़ते हैं, जबकि यह पूरी तरह से गलत और अज्ञानपूर्ण दृष्टिकोण है।
- रासलीला के समय श्रीकृष्ण मात्र 8 वर्ष के थे, अतः सांसारिक अर्थ में किसी प्रकार का संबंध असंभव है।
- सप्तदेवता कभी कामदेव के अधीन नहीं होते।
- श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वर हैं, जिनमें वासना का कोई स्थान नहीं। इसके विपरीत, उनके संपर्क से गोपियों की वासनाएं समाप्त हुईं और वे पवित्र हो गईं।
रासलीला वास्तव में भक्ति और आत्मा की परम शुद्धि का प्रतीक है।
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल लीलाओं और चमत्कारों का संग्रह नहीं, बल्कि एक पूर्ण जीवन-दर्शन है। उनके उपदेश, गीता का ज्ञान, और भक्तों के साथ उनके दिव्य संबंध हमें यह सिखाते हैं कि धर्म, सत्य और करुणा के मार्ग पर चलना ही जीवन का सार है।
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