प्रशासकीय शासन में दबी जनता की आवाज, चार कुर्सियों में उलझा एक अफसर, व्यवस्था बेहाल

राजस्थान में स्थानीय निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद लागू प्रशासकीय शासन अब वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आमजन के लिए परेशानी, उपेक्षा और निराशा का दूसरा नाम बनता जा रहा है। जिन संस्थाओं के माध्यम से जनता अपनी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान सीधे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से कर पाती थी, आज वही संस्थाएँ फाइलों, तारीखों और “आज साहब उपलब्ध नहीं हैं” जैसे जवाबों में कैद हो गई हैं।
सुमेरपुर और तखतगढ़ क्षेत्र के हालात इस पूरे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी हैं। वर्तमान में सुमेरपुर उपखंड अधिकारी को एक साथ— उपखंड अधिकारी, सुमेरपुर नगरपालिका प्रशासक, पंचायत समिति सुमेरपुर प्रशासक, और अब तखतगढ़ नगरपालिका प्रशासक जैसी चार-चार जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं।
आमजन की समस्याएं कोई असाधारण नहीं हैं— कहीं नालियां जाम हैं, कहीं सड़कें टूटी पड़ी हैं, कहीं पानी की सप्लाई ठप है, कहीं सफाई कर्मचारी महीनों से नदारद हैं, तो कहीं जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, पेंशन और पट्टों की फाइलें महीनों से धूल खा रही हैं।
सुमेरपुर नगरपालिका का कार्यकाल नवंबर 2024 में समाप्त हो चुका है, लेकिन वहां करीब 16 माह से प्रशासकीय शासन चल रहा है। पंचायत समिति सुमेरपुर का कार्यकाल भी तीन माह पूर्व समाप्त हो चुका है। 6 फरवरी को तखतगढ़ नगरपालिका का कार्यकाल पूरा होने के बाद 9 फरवरी को वही उपखंड अधिकारी वहां भी प्रशासक नियुक्त कर दिए गए।
संविधान ने प्रशासकीय शासन को केवल अस्थायी विकल्प के रूप में स्वीकार किया है, स्थायी समाधान के रूप में नहीं। स्थानीय निकाय लोकतंत्र की जड़ हैं।
प्रशासकीय शासन के लंबे खिंचते दौर ने अब जनता और प्रशासन के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है। यह वह दीवार है जहां शिकायतें सुनने वाला कोई नहीं, जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं और निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह केंद्रीकृत हो चुकी है। जब एक ही अधिकारी चार संस्थाओं का भार संभालता है, तो शासन स्वाभाविक रूप से फाइल-आधारित और संवेदनहीन बन जाता है।
यह स्थिति न केवल आम नागरिक के अधिकारों का हनन है, बल्कि संविधान की उस भावना के भी विपरीत है, जिसमें स्थानीय स्वशासन को लोकतंत्र की पहली सीढ़ी माना गया है। निर्वाचित प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी में जनता की आवाज न तो सही मंच तक पहुंच पा रही है और न ही समस्याओं का समयबद्ध समाधान हो रहा है।
चार्ज व्यवस्था का सबसे खतरनाक असर यह है कि असफलता की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती। काम नहीं हुआ तो दोष किसका—प्रशासक का, व्यवस्था का या सिस्टम का? यही असमंजस जनता को सबसे ज्यादा पीड़ा दे रहा है।
- क्या एक अधिकारी चार संस्थाओं के साथ न्याय कर सकता है?
- प्रशासकीय शासन कब तक लोकतंत्र का विकल्प बना रहेगा?
- स्थानीय चुनावों में हो रही देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार जल्द से जल्द स्थानीय निकाय चुनाव कराए, प्रशासकीय बोझ को यथार्थ के अनुसार बांटे और जनता को फिर से प्रतिनिधित्व का अधिकार लौटाए। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का नाम है।













