बालमुनि श्री विमल पुण्य विजयजी का जन्मभूमि जीवाणा में प्रथम आगमन, भव्य स्वागत

जालोर जिले के जीवाणा गांव में जैन समाज के लिए अत्यंत हर्ष का अवसर रहा जब जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. ठाणा-5 भाण्डवपुर से विहार करते हुए जीवाणा पधारे। इस अवसर पर उनके प्रशिष्य बालमुनि श्री विमल पुण्य विजयजी अपने दीक्षा जीवन में पहली बार अपनी सांसारिक जन्मभूमि जीवाणा पहुंचे।
इस शुभ अवसर पर श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ जीवाणा तथा बालमुनि श्री के सांसारिक परिवार की ओर से भव्य स्वागत किया गया। मातुश्री श्री टिपूबाई कलाजी कंकु चोपड़ा के नेतृत्व में पूरे उत्साह के साथ आयोजन किया गया। साण्डेराव से आई बाबू बैंड गरबा नृत्य मंडली तथा स्थानीय ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य सामैया निकाला गया।
मार्ग में कंकु चोपड़ा के गृहांगण में जैनाचार्य श्री के पगले हुए। इस दौरान 50 महिलाओं ने मंगल कलश लेकर जैनाचार्य श्री की तीन प्रदक्षिणा की। इसके बाद उपाश्रय में धर्मसभा का आयोजन किया गया। बाल संगीतकार नमन जैन एवं सिद्धार्थ मुथा ने गुरु भक्ति के गीत प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में बालमुनि श्री विमल पुण्य विजयजी ने प्रवचन दिया। इसके पश्चात जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार अखंड दीपक में लगातार घी डालने से वह वर्षों तक जलता रहता है, उसी प्रकार मोक्ष मार्ग बताने वाले जैन शासन में अनेक महान संतों का योगदान रहा है और आगे भी होता रहेगा।
उन्होंने कहा कि भूतकाल में विज स्वामी, आचार्य हेमचंद्र सूरीश्वरजी, बप्पभट्टी सूरिजी जैसे महापुरुषों ने कम उम्र में दीक्षा लेकर जैन शासन की प्रभावना और रक्षा का कार्य किया। उनके द्वारा किए गए कार्यों को सदियों बाद भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। हमें उनके त्याग, समर्पण और आदर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए। दोपहर 3 बजे मंदिरजी में वर्धमान शक्रस्तव महाभिषेक का आयोजन हुआ। आगामी 9 मार्च को संयम संवेदना कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
















