भूल की सजा आत्मा को भुगतनी ही पड़ती है: आचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी

- उदयपुर, (चित्रकूट नगर):
जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में श्री महावीर जैन विद्यालय, चित्रकूट नगर में भद्रंकर परिवार द्वारा आयोजित सामूहिक उपधान तप बड़े उत्साह से चल रहा है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि अनादिकाल से आत्मा संसार की चार गतियों और चौरासी लाख योनियों में भटक रही है। कभी देव बनती है, तो कभी भिखारी। कभी सत्ताधीश बनती है, तो कभी अन्न के लिए तरसती है। कभी बुद्धिमान बनकर सम्मान पाती है, तो कभी पागल बनकर तिरस्कार सहती है। कभी सवार होती है तो कभी घोड़ा, ऊँट या अन्य सवारी के रूप में जन्म लेती है।

उन्होंने कहा कि आत्मा ने असंख्य जन्मों में अपमान, यातना और तिरस्कार सहा है। इसका कारण केवल एक है—कर्म का बंधन। जब तक आत्मा गलत प्रवृत्तियाँ करती है, तब तक कर्म बंधता रहता है और उस कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। कोर्ट-कचहरी में धनबल से न्याय को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन कर्म के न्याय से कोई नहीं बच सकता।
आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि चाहे राजा हो या चक्रवर्ती, चाहे मोक्ष प्राप्त करने वाली आत्मा हो या अंतिम भव में तीर्थंकर बनने वाली आत्मा—पूर्व जन्मों की भूल की सजा से कोई मुक्त नहीं हो सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में आत्मा के भटकाव की जड़ मिथ्यात्व है, यानी बुद्धि का विपर्यास। यही मिथ्यात्व आत्मा को संसार से मुक्ति की इच्छा से भी दूर रखता है। क्षणिक सुख पाकर आत्मा स्वयं को तृप्त मान लेती है और इस दुःखमय संसार को सुखमय समझने का भ्रम पाल लेती है।














