मेवाड में शोक की लहर , मेवाड़ महामंडलेश्वर मंहत चेतन दास जी महाराज का निधन

मुंगाणा सावलिया धाम मुंगाणा के मेवाड़ संत परंपरा के गौरव धर्म सेवा और साधना के प्रतिक महामंडलेश्वर 1008 महंत श्री चेतन दास महाराज का 90 वर्ष मे हुआ निधन
गंभीर अवस्था में मुंगाना धाम से कपासन उप जिला चिकित्सा लेकर पहुंचे थे भक्त, बाद परीक्षण चिकित्सकों के निधन की पुष्टि की, मुंगाना धाम आश्रम में जुटने लगे श्रद्धालु !, अंतिम संस्कार में गुजरात, मेवाड़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से हजारों शिष्यों के जुटने की संभावना!
आपका सम्पूर्ण जीवन अध्यात्म, समाजसेवा और सनातन धर्म की चेतना को जाग्रत करने में समर्पित रहा। आपने अपने उपदेशों से लाखों श्रद्धालुओं के जीवन को आलोकित किया और एक आदर्श मार्गदर्शक के रूप में समाज को सत्य, अहिंसा, और करुणा की राह दिखाई।
आपका निधन न केवल मेवाड़ अपितु सम्पूर्ण संत समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। आपका सान्निध्य और आशीर्वाद हम सबके जीवन की अमूल्य धरोहर रहेगा। गुरुदेव बिहारी दास जी महाराज के साथ रघुवर रामायण मंडल के साथ गांव गांव जाकर रामायण का चित्रण किया करते थे और मुंगाणा गांव में आकर बिहारी दास जी महाराज ने धूणी डाली और यहीं पर सथायी हो कर रह गए। अपने गुरुदेव बिहारी दास जी महाराज के देवलोकगमन होने के उपरांत आप हर वर्ष गुरु पूर्णिमा को मनाते आ रहे हैं जिसमें हर वर्ष लाखों शिष्य और श्रद्धालु मुंगाणा आकर गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाते हैं

आपने अपने जीवन काल में मेवाड़ मालवा क्षेत्र में गांव गांव में मंदिरों का नवनिर्माण जीर्णोद्धार कराया था। राम नाम की अलख जगाई।गौ सेवा परम पुनीत कार्य किया है। पहले अपने गुरुदेव के धूणी स्थल पर बालाजी महाराज का मंदिर बनवाया और सन् 1987 में वैसाख माह में सांवलिया घनश्याम की मूर्ति को स्थापित करवाई महामंडलेश्वर चेतन दास मेवाड़-मालवा, गुजरात, महाराष्ट्र और संपूर्ण राजस्थान क्षेत्र के प्रसिद्ध संत थे। उन्होंने लगभग 1700 मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा करवाई। जिसमें कई मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया। पिछले 30 वर्षों से कुंभमेले में संतों और श्रद्धालुओं की सेवा के लिए मेवाड़ मीरा खालसा का संचालन कर रहे थे।
गंगरार क्षेत्र के करेडिया में जन्मे महंत का बचपन का नाम गणेश था। बूढ़ गांव के संत बिहारीदास से प्रभावित होकर उनकी शरण में चले गए। गुरु के साथ मुंगाना के नृसिंहद्वारा में रहने लगे। 1961 में संत बिहारीदास के देहावसान के बाद उनकी स्मृति में गुरु पूर्णिमा महोत्सव मनाने लगे। प्रयाग कुंभमें चार अनी अखाड़ों के जगदगुरुओं ने उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि से सम्मानित किया। मुंगाणा आश्रम में गोशाला और अन्नपूर्णा भोजनशाला, वेद गुरुकुल का संचालन होता है।














