सुख–दुःख देने वाला अपना स्वयं का ही कर्म है

जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेनसूरीश्वरजी म.सा. आदि की शुभ निश्रा में श्री महावीर जैन विद्यालय, चित्रकूट नगर में श्री भद्रंकर परिवार एवं उपधान तप आयोजक समिति द्वारा महामंगलकारी उपधान तप बड़े हर्ष और उत्साह के साथ चल रहा है।
धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्य श्री ने कहा कि –
“उपकार करने वाले व्यक्ति को उपकारी मानना सरल है, परंतु अपकार करने वाले के प्रति भी मन में दुर्भाव न रखकर उसे अपना उपकारी मानना अत्यंत कठिन है। संसार कहता है – जैसे के साथ तैसा व्यवहार करो। परंतु धर्म कहता है – जो हमारे प्रति बुरा करे, उसके प्रति भी शुभ भाव रखना ही सच्चा धार्मिक आचरण है।”
उन्होंने आगे कहा कि जीवन में प्राप्त होने वाले सुख–दुःख का कारण कोई और नहीं, बल्कि हमारे अपने कर्म हैं। अपने पुण्य कर्मों से सुख और पाप कर्मों से दुःख प्राप्त होता है। जो व्यक्ति दुःख देने वाला प्रतीत होता है, वह तो केवल निमित्त मात्र है; उसके प्रति द्वेष रखना अज्ञान है।



जैनाचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा – “जिस प्रकार कोई व्यक्ति गधे को किसी को लात मारते देख स्वयं गधे को लात नहीं मारता, वैसे ही हमें अपने प्रति दुर्व्यवहार करने वाले के प्रति दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए।”
उन्होंने समझाया कि जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों को तुच्छ समझकर भूल जाना चाहिए, और बड़ी कठिनाइयों को भगवान व कर्मसत्ता पर छोड़ देना चाहिए।
उन्होंने अंत में कहा कि अनुकूल परिस्थितियों में समता रखना आसान है, परंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता बनाए रखना ही वास्तविक साधना है।
आगामी कार्यक्रम:
दिनांक: 5 नवम्बर 2025 प्रातः 7:30 बजे
जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेनसूरीश्वरजी म.सा. आदि साधु-साध्वीवृंद का चातुर्मास परिवर्तन एवं श्री शत्रुंजय महातीर्थ पट्टदर्शन चैत्य वंदन महेन्द्रभाई शेठ परिवार के गृहांगण में संपन्न होगा।














