स्वदेशी अपनाओ, विदेशी हटाओ: आजाद मैदान से उठी आत्मनिर्भर भारत की गूंज

मुंबई के आजाद मैदान में 9 अगस्त 2025 को देश की आर्थिक और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक आंदोलन का आगाज हुआ। “स्वदेशी लाओ – विदेशी हटाओ” के गगनभेदी नारों के साथ देश के छोटे व्यापारियों, कामगार संगठनों, किसानों और सामाजिक संगठनों ने विदेशी वस्तुओं के बढ़ते आयात के खिलाफ एकजुट होकर बिगुल फूंका। इस जनआंदोलन का नेतृत्व किया कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री और अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने।
कार्यक्रम का आयोजन कैट, प्लेटफॉर्म ऐप बेस्ट एंड आदर कॉमर्स वर्कर्स यूनियन, गिग वर्कर्स यूनियन, हॉकर्स जॉइंट एक्शन कमिटी समेत कई अन्य संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने भारत में विदेशी वस्तुओं की बाढ़ के खिलाफ आक्रोश प्रकट किया और सरकार से आयात पर सख्त नियंत्रण, घरेलू उद्योगों को संरक्षण और युवाओं के लिए रोजगार सृजन की मांग की।
शंकर ठक्कर ने कहा कि 2023-24 में भारत का व्यापार घाटा 265 अरब डॉलर पार कर गया, जिससे देश की मुद्रा पर दबाव बढ़ा और महंगाई में इजाफा हुआ। सस्ते आयात ने देशी दुकानदारों, कारीगरों, और किसानों की कमर तोड़ दी है। उन्होंने सरकार से डंपिंग पर रोक, MSME क्षेत्र को सहायता, और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को गति देने की पुरजोर अपील की।
डॉ. लक्ष्मण आर्य, जनरल सेक्रेटरी (प्लेटफॉर्म ऐप बेस एंड अदर यूनियन) ने कहा कि उपभोक्तावाद और विदेशी जीवनशैली के अंधानुकरण ने भारतीय पारिवारिक ढांचे को गहराई से चोट पहुंचाई है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है, और सामाजिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है।
कार्यक्रम संयोजक संतोष खटावकर ने बताया कि ग्रामीण से शहरी पलायन के कारण ट्रांसनेशनल परिवार बन रहे हैं जिससे भावनात्मक और आर्थिक दूरी बढ़ रही है।
अन्य प्रमुख सहभागी जैसे जनार्दन शिरवले, कैलास रांजणे, सचिन माने, चेतन अवचार, सागर तुपे, संतोष शिंदे सहित कई कामगार नेताओं ने भी अपने विचार रखे और विदेशी उत्पादों के बहिष्कार को जन-आंदोलन बनाने का संकल्प लिया।
आंदोलन के मंच से यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया कि अब समय आ गया है कि भारत आत्मनिर्भर बने, स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता दे, किसानों, महिलाओं, युवाओं और कारीगरों को आर्थिक संबल मिले, और पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हो। आंदोलन ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर पूरे देश में “स्वावलंबी भारत, समृद्ध भारत” का संदेश गूंजा दिया।











