संघ शताब्दी वर्ष पर नोहर में प्रमुख जन गोष्ठी संपन्न

नोहर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में पूरे जिले में उत्साहपूर्वक विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। पथ संचलन और व्यापक गृह संपर्क अभियान के बाद इस श्रृंखला में नोहर के आचार्य तुलसी भवन में एक प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों एवं मातृशक्ति ने भाग लिया।
मुख्य अतिथियों ने किया दीप प्रज्वलन
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि—
- डॉ. श्रीकांत, राजस्थान क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख (मुख्य वक्ता)
- महंत रामनाथ अवधूत, भारत माता आश्रम
- शिवभगवान पारीक, सामाजिक कार्यकर्ता
द्वारा मां भारती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर एवं सामूहिक वंदेमातरम के साथ हुई।
संघ के 100 वर्षों की यात्रा—सेवा और राष्ट्र भावना
महंत रामनाथ अवधूत ने अपने संबोधन में संघ की शताब्दी वर्ष की उपलब्धियों, सेवा कार्यों और जनहित में किए गए दीर्घकालिक प्रयासों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ ने सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए समाज के हर वर्ग में प्रेरक कार्य किए हैं।
इसके बाद काव्य-गीत प्रस्तुत कर वातावरण को राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत किया गया।
संघ एक साधना—डॉ. श्रीकांत
मुख्य वक्ता डॉ. श्रीकांत ने अपने बौद्धिक संबोधन में संघ की रीति-नीति, कार्यपद्धति और ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के सिद्धांत पर गहन चर्चा की।
उन्होंने कहा—
“संघ सौ वर्षों की एक निरंतर साधना है, जिसका मूल भाव सदैव राष्ट्र प्रथम रहा है।”
हिंदुत्व को उन्होंने “एक जीवनशैली” बताते हुए कहा कि हिंदू समाज सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना का वास्तविक पालन करता है।
वसुधैव कुटुंबकम् की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि “पूरी पृथ्वी हमारा परिवार है और विश्व में संकट आने पर भारत सदैव आगे रहता है।”
डॉ. श्रीकांत ने कहा कि संघ का स्वयंसेवक नाम और यश की इच्छा से परे होता है—
“एक हाथ से दिया गया दान दूसरे हाथ को ज्ञात न हो—यही संघ की परंपरा है।”
भारतीय संस्कृति, परिवार और समरसता पर बल
अपने विस्तृत उद्बोधन में उन्होंने कहा—
वेद एवं शास्त्र सनातन संस्कृति के प्राण हैं।
प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार अपनी पत्नी को छोड़कर सभी स्त्रियों को मां समान देखा जाता है—यह नारी सम्मान का मूल भाव है।
गीता, रामायण एवं महाभारत जैसे ग्रंथ हिंदुत्व के गहन दर्शन प्रस्तुत करते हैं।
कुटुंब प्रबोधन पर उन्होंने कहा—
- सप्ताह में एक बार परिवार बैठक हो,
- हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ,
- परिवार के सदस्यों के पढ़े–सुने–देखे अच्छे विषयों पर चर्चा अवश्य हो।
- स्वभाषा, स्वभूषा तथा सांस्कृतिक भ्रमण का अभ्यास परिवारों में बढ़ाना चाहिए।
समरसता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि
- जातिगत भेदभाव और छुआछूत समाज के लिए घातक हैं।
- तुलनात्मक भावना छोड़ समानता की भावना अपनानी होगी।
पर्यावरण, आयुर्वेद और नई शिक्षा नीति पर विचार
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, नैतिक शिष्टाचार और सामाजिक कर्तव्यों पर लोगों से गंभीरता से कार्य करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा—
- आयुर्वेद को समझना और अपनाना समय की आवश्यकता है।
- नई शिक्षा नीति से विद्यार्थियों का समग्र विकास संभव होगा।
पंच परिवर्तन और मातृशक्ति की भूमिका
उन्होंने कहा कि संघ के दूसरे शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन को समाज में सुदृढ़ रूप से लागू करने की दिशा में कार्य होगा।
उन्होंने मातृशक्ति से आह्वान किया कि वे भी सेवा, संपर्क और संस्कार प्रचार में अग्रणी भूमिका निभाएं।
- जनसंख्या नियंत्रण नहीं, संतुलन आवश्यक है, यह बात उन्होंने विशेष रूप से कही।
उन्होंने समाज में भटके हुए युवाओं और बच्चों को सही मार्गदर्शन देने पर भी जोर दिया।
डॉ. हेडगेवार के जीवन से सीख
उन्होंने कहा कि संघ को सही समझने के लिए सबसे पहले डॉ. हेडगेवार को समझना आवश्यक है।
उनका जीवन त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का आदर्श उदाहरण है।
कार्यक्रम में हुई उल्लेखनीय उपस्थिति
इस प्रमुख जन गोष्ठी में— जिला प्रचारक राधेश्याम, खंड कार्यवाह कमल शर्मा, नगर कार्यवाह रमेश पारीक, विस्तारक टीकूराम, सहित संघ टोली, नगर के प्रबुद्धजन, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, शिक्षाविद और बड़ी संख्या में मातृशक्ति उपस्थित रही।












