धारा 151 का दुरुपयोग और कुड़ी भगतासनी थाने का मामला—राजस्थान पुलिस में ‘वर्दी का रोब’ कब रुकेगा?
राजस्थान पुलिस में जनता से बदसलूकी और अधिकारों के दुरुपयोग की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। हाल ही में कुड़ी भगतासनी थाने के अधिकारी हमीर सिंह द्वारा आम नागरिक से अभद्र भाषा में बात करने और धौंस जमाने का मामला इस बात का ताज़ा उदाहरण है कि कुछ पुलिसकर्मियों के रवैये में सुधार के लिए सरकार को अब केवल सलाह नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई की ज़रूरत है। यह घटना कोई नई नहीं—राजस्थान के लगभग हर जिले के कई थानों में ऐसे पुलिस कर्मचारी मिल ही जाते हैं, जिन्हें लगता है कि वर्दी पहनते ही जनता से ऊँची आवाज़ में बात करना उनका अधिकार है।

- जोधपुर।
जोधपुर। राजस्थान पुलिस का व्यवहार लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है, और कुड़ी भगतासनी थाने के अधिकारी हमीर सिंह द्वारा आमजन से बदसलूकी का ताजा मामला इस बहस को और तीखा कर गया है। यह घटना कोई नई नहीं है। राजस्थान के लगभग हर जिले, हर थाने में ऐसे पुलिसकर्मी आसानी से मिल जाते हैं जो जनता से बातचीत के नाम पर रौबदारी, दबंगई, तू-तड़ाक और अपमानजनक भाषा को ही अपना अधिकार समझते हैं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि ऐसे कर्मचारी धारा 151 को अपनी जेब का “तुरुप का पत्ता” बना चुके हैं। जनता ने कुछ ऐसा बोल दिया जो इनको पसंद नहीं आया—सीधे 151। किसी ने सवाल पूछ लिया—151। किसी ने थाने में अपने अधिकार की बात कर दी—151। यहाँ तक कि बुजुर्गों ने भी सम्मानपूर्वक कुछ कहा तो उन पर भी 151 लगा देना मानो कुछ पुलिसकर्मियों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी है।
धारा 151—सुरक्षा के लिए बनी, डराने का हथियार बन गई
धारा 151 का उद्देश्य था “शांति भंग की आशंका” के मामलों में एहतियात के तौर पर कार्रवाई करना।
लेकिन आज यह धारा कई पुलिसकर्मियों के लिए निजी चाबुक बन चुकी है—
- सवाल पूछ लिया — धारा 151
- नियम समझाने की कोशिश की — धारा 151
- बुजुर्ग ने सम्मान से भी कुछ कहा — धारा 151
- थाने में अपने अधिकारों की बात की — धारा 151
यानी कानून की यह धारा अब “आशंका” से ज़्यादा “अहंकार” का हथियार बन चुकी है।
इसका परिणाम यह है कि निर्दोष लोग भी थाने-हवालात और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फँस जाते हैं, जबकि पुलिसकर्मियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
हमीर सिंह का मामला—सिस्टम की बीमारी का लक्षण
कुड़ी भगतासनी थाने में हमीर सिंह द्वारा बतमीज़ी की घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि—
✔ कुछ पुलिसकर्मी जनता को “अपराधी” मानकर ही व्यवहार करते हैं
✔ आवाज़ ऊँची, गाली-गलौज और डराना रोजमर्रा की प्रक्रिया है
✔ बुजुर्गों, महिलाओं और आम नागरिकों के साथ संवेदनशीलता नदारद है
✔ शिकायतकर्ता को ही दोषी कहा जाता है
✔ धारा 151 इनके लिए तुरुप का पत्ता है
ऐसे मामलों के कारण पुलिस और जनता के रिश्तों में गहरा अविश्वास पैदा हो रहा है।
सरकार और विभाग प्रयास करते हैं—लेकिन ज़मीन पर असर नहीं
हालाँकि सरकार और पुलिस विभाग—
- पुलिस सुधारों की बात करते हैं
- प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं
- जनसहयोगी पुलिसिंग की योजनाएँ बनाते हैं
- वरिष्ठ अधिकारी आदर्श व्यवहार का संदेश देते हैं
लेकिन वास्तविकता यह है कि—
कुछ पुलिसकर्मी न नियम मानते हैं, न गाइडलाइन, न मानवीयता।
उनके लिए वर्दी “सेवा का माध्यम” नहीं, “सत्ता दिखाने का औज़ार” बन चुकी है।
राज्य सरकार को अब ‘तमीज की पाठशाला’ अनिवार्य करनी होगी
पुलिस ट्रेनिंग में शारीरिक प्रशिक्षण और कानून पढ़ाने पर जोर दिया जाता है, लेकिन व्यवहार, संवाद-कौशल, जनसंपर्क और भावनात्मक संतुलन की कमी साफ दिखाई देती है।
अब सरकार को पुलिस के लिए अनिवार्य “Behavioural Training” लागू करनी चाहिए—
✔ जनता से सम्मानपूर्वक बात करने का तरीका
✔ बुजुर्गों व महिलाओं से संवेदनशील संवाद
✔ शिकायतकर्ता को अपराधी समझने की गलती से बचना
✔ तनाव प्रबंधन
✔ वर्दी की गरिमा बनाए रखना
यह प्रशिक्षण हर साल “रीफ्रेशर कोर्स” के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
अब सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे
अगर पुलिस-जनता संबंध सुधारना है, तो अब आधे-अधूरे उपाय नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक बदलाव करने होंगे।
1. धारा 151 के उपयोग पर सख्त नियम
- उच्च अधिकारियो की लिखित अनुमति के बिना 151 नहीं
- हर कार्रवाई की वीडियो/ऑडियो रिकॉर्डिंग
- गलत पाए जाने पर तत्काल निलंबन
2. व्यवहार सुधार प्रशिक्षण अनिवार्य
- जनसंवाद
- भावनात्मक नियंत्रण
- बुजुर्गों/महिलाओं से संवाद
- तनाव प्रबंधन
- वर्दी की गरिमा
3. थानों में ‘बिहेवियर मॉनिटरिंग सिस्टम’
- सीसीटीवी + ऑडियो अनिवार्य
- थर्ड-पार्टी निरीक्षण
- हर महीने व्यवहार रिपोर्ट
4. बदसलूकी पर कड़ी सजा
- वेतन रोक
- रैंक घटाना
- थाने से हटाना
- पुनः प्रशिक्षण
- दोहराव पर बर्खास्तगी
वर्दी की ताकत—सेवा के लिए है, दबाव बनाने के लिए नहीं
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस का प्रमुख कर्तव्य है—
जनता की सुरक्षा, सम्मान और सहायता।
अगर पुलिस ही जनता से दुर्व्यवहार करेगी तो—
- पुलिस पर भरोसा टूटेगा
- कानून का सम्मान कम होगा
- समाज और पुलिस के बीच दूरी बढ़ती जाएगी
वर्दी की गरिमा तभी बनी रह सकती है जब उसके भीतर इंसानियत ज़िंदा हो।
पुलिस सुधार ज़रूरी है — और तुरंत ज़रूरी है
हमीर सिंह जैसे मामलों ने यह साफ कर दिया है कि—
- ✔ धारा 151 का दुरुपयोग रोकना अनिवार्य है
✔ पुलिस को व्यवहार की नई पाठशाला चाहिए
✔ जनता को सम्मान और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए
✔ पुलिसिंग का मतलब डर नहीं—विश्वास होना चाहिए
अगर सरकार सख्त कदम उठाती है और सिस्टम में व्यवहार सुधार लागू करती है, तो राजस्थान पुलिस का चेहरा बदल सकता है।
क्योंकि— समाज पुलिस से डरकर नहीं, पुलिस पर भरोसा करके सुरक्षित होता है।
वर्दी की गरिमा सेवा के लिए है, सत्ता दिखाने के लिए नहीं। संविधान ने पुलिस को अधिकार इसलिए दिए हैं कि वे जनता की सुरक्षा, सम्मान और सहायता कर सकें—न कि उनका अपमान करें।
पुलिस सुधार अब विकल्प नहीं, समय की सबसे बड़ी ज़रूरत
हमीर सिंह जैसे मामलों ने साबित कर दिया है कि पुलिस व्यवस्था में व्यवहारिक सुधार की भारी ज़रूरत है। धारा 151 के दुरुपयोग को रोकना होगा, पुलिस को तमीज और संवेदनशीलता सीखानी होगी, और थानों की कार्यप्रणाली को जनता-केंद्रित बनाना होगा।
पुलिस की वर्दी तभी सम्मान पाती है जब उसके भीतर इंसानियत ज़िंदा हो। अच्छी पुलिसिंग डर से नहीं—सम्मान और विश्वास से होती है।










