एक व्यक्ति, जिसने बंजर ज़मीन को वन बना दिया

- बनेड़ा
बाऊजी की कहानी, जो हर पीढ़ी को कुछ छोड़ जाने की सीख देती है
कभी-कभी इतिहास किताबों में नहीं, बल्कि पेड़ों की छांव, पक्षियों की चहचहाहट और मिट्टी की खुशबू में लिखा जाता है। ऐसी ही एक जीवंत मिसाल हैं शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र के ढीकोला गांव निवासी स्वर्गीय श्री कैलाश चंद्र जी चौबे, जिन्हें गांव और आसपास के क्षेत्र में स्नेहपूर्वक “बाऊजी” के नाम से जाना जाता था।
बाऊजी एक साधारण राजकीय शिक्षक थे, लेकिन उनका जीवन असाधारण था। उन्होंने न तो किसी पद का सहारा लिया, न किसी प्रचार की चाह रखी। वे चुपचाप वह काम करते रहे, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गया।
शिक्षक से कहीं आगे की पहचान
राजकीय सेवा में अध्यापक रहते हुए बाऊजी ने केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया, बल्कि बच्चों और समाज को अनुशासन, संवेदनशीलता और प्रकृति से जुड़ाव का पाठ सिखाया। उनका स्वभाव अत्यंत शांत, करुणामय और संघर्षों के सामने अडिग था। वे मानते थे कि शिक्षा केवल शब्दों में नहीं, कर्मों में दिखनी चाहिए।
बंजर ज़मीन में भविष्य का सपना
जब पर्यावरण संरक्षण कोई आम चर्चा का विषय नहीं था, उस समय बाऊजी ने यह संकल्प लिया कि वे धरती को खाली हाथ नहीं छोड़ेंगे। ढीकोला गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर शाहपुरा मार्ग पर स्थित कांटों, पत्थरों और झाड़ियों से भरी बंजर भूमि को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
जहां आम लोग उपेक्षा देखते थे, वहां बाऊजी ने एक हरे-भरे वन का भविष्य देखा।

साइकिल, पानी के केन और अथक परिश्रम
बाऊजी का दैनिक जीवन सेवा का प्रतीक था। साइकिल पर पानी के केन लटकाकर पौधों को सींचना, तपती धूप में पौधारोपण करना, सूख चुके पौधों को दोबारा लगाना—यह सब उनके जीवन का हिस्सा बन गया था।
पानी की समस्या आई तो उन्होंने किसी से मदद मांगने के बजाय अपने निजी खर्च से पहले कुआं और बाद में तालाब बनवाया। न कोई शोर, न कोई श्रेय की अपेक्षा—बस निस्वार्थ सेवा।
“कैलाश नाड़ी” का जन्म
समय के साथ वह बंजर भूमि हरियाली में बदलने लगी। नीम, पीपल, बरगद, शीशम, गुलमोहर जैसे वृक्षों के साथ-साथ पक्षियों की चहचहाहट लौट आई। आज यह क्षेत्र “कैलाश नाड़ी” के नाम से जाना जाता है।
यह केवल एक वन क्षेत्र नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की वर्षों की तपस्या, समर्पण और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है।
समाज के हर कोने में बाऊजी का योगदान
बाऊजी की सेवा केवल कैलाश नाड़ी तक सीमित नहीं रही। गांव के देवस्थान, श्मशान घाट, तालाब और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर उनका मौन श्रम साफ दिखाई देता है।
श्मशान घाट पर लगाए गए पीपल और बरगद उनके विचार को दर्शाते हैं कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी मनुष्य को छाया और सुकून मिलना चाहिए।
अंतिम समय तक सेवा का भाव
3 अक्टूबर को वे रोज़ की तरह कैलाश नाड़ी में सेवा कार्य करते हुए अचानक अस्वस्थ हो गए। लगभग तीन महीनों तक बीमारी से संघर्ष करने के बाद 3 जनवरी 2026 को उनका देहावसान हो गया।
लेकिन बाऊजी केवल शरीर से गए हैं, उनके विचार और कर्म आज भी जीवित हैं।
अपने अंतिम दिनों में भी वे हाथ जोड़कर बस यही कहते रहे—
“इन पेड़ों को बचा लीजिए, इनके चारों ओर दीवार बनवा दीजिए।”
पीढ़ियों के लिए छोड़ी गई अमूल्य विरासत
आज बाऊजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी लगाई हरियाली आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती रहेगी कि मनुष्य का कद उसके पद से नहीं, बल्कि धरती के लिए छोड़ी गई विरासत से मापा जाता है।
बाऊजी अमर हैं—
हर उस पत्ते में, जो हवा से बातें करता है।
हर उस छांव में, जो राहगीरों को सुकून देती है।














