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जीवाणा जालोर में संयम संवेदना कार्यक्रम, जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी ने बताया आत्मा और देव-गुरु का महत्व

जीवाणा (जालोर) में जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी का प्रेरक प्रवचन, देव-गुरु के समागम से आत्मा पूज्य बनती है


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विक्रम बी राठौड़
रिपोर्टर

विक्रम बी राठौड़, रिपोर्टर - बाली / मुंबई 

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जालोर जिले के जीवाणा में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ के प्रांगण में जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में उनके संयम जीवन के स्वर्णिम वर्ष में मंगल प्रवेश के उपलक्ष्य में संगीत के साथ संयम संवेदना कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मुंबई से पधारे मंच संचालक चेतनभाई मेहता ने जैनाचार्य के जीवन के अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हिन्दी भाषा में जैन धर्म पर 270 पुस्तकों का लेखन है, जो समाज और धर्म के लिए महत्वपूर्ण योगदान है।

कार्यक्रम के दौरान संगीतकार पवन भाई और नमन जैन ने सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

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धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी ने कहा कि जिस प्रकार चावल का दाना स्वच्छ, सुंदर और उज्ज्वल होता है, और जब वह कुंकुम के साथ मिलकर राजतिलक में उपयोग होता है तो राजा भी उसे सम्मान देते हैं। लेकिन जब वही चावल कुंकुम से अलग होकर मूंग की दाल के साथ मिल जाता है तो उसका रूप-रंग बदलकर वह खिचड़ी बन जाता है।

इसी प्रकार आत्मा भी स्वभाव से पवित्र, सुंदर और अनंत गुणों से युक्त होती है। जब आत्मा देव, गुरु और धर्म के समागम में आती है, तो वह जगत के लिए पूजनीय बन जाती है। लेकिन जब वह सांसारिक संबंधों में उलझ जाती है, तो कर्मों के प्रभाव से मलिन होकर चार गतियों में भटकती रहती है।

उन्होंने कहा कि संसार के सभी संबंध सीमित समय तक ही रहते हैं, जबकि देव-गुरु और धर्म से जुड़ा संबंध अनंतकाल तक स्थायी रहता है। इसलिए सांसारिक मोह को त्यागकर देव-गुरु और धर्म से जुड़ना ही जीवन का कल्याणकारी मार्ग है।

इस अवसर पर श्रद्धालुओं को जानकारी दी गई कि 10 मार्च को प्रातः 9 बजे जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी का प्रेरणादायी प्रवचन आयोजित होगा।

न्यूज़ डेस्क

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