नवरात्रि में देवी द्वारा धारण किए गए नौ रूप एवं उनकी कार्यानुसार विशिष्टताएं

प्राचीन काल से नवरात्रि का व्रत किया जाता है। इन नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है । नवरात्रि के निमित्त हम इन देवियों के नौ रूपों की महिमा जानेंगे। नवरात्रि का व्रत अर्थात आदि शक्ति की उपासना है। नवरात्रि के प्रथम दिन आदिशक्ति देवी का प्रकट होने वाला शैलपुत्री रूप !
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वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृृतशेखराम।
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वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।
अर्थ : मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृषभ पर आरूढ, त्रिशूल धारिणी, वैभवशाली ऐसी शैलपुत्री देवी को इच्छित मनोकामना पूर्ण हो इसलिए मैं वंदन करता हूं।
*शैलपुत्री* : पर्वत राज हिमालय की कन्या शैलपुत्री समस्त देवताओं के अहंकार का भी हरण करने वाली हैं। भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली, चंद्रालंकार धारण करने वाली, वृषभ आरूढ, त्रिशूल धारिणी एवं यश प्राप्त करवाने वाली शैलपुत्री देवी के चरणों में कोटि-कोटि वंदन।
नवरात्रि के दूसरे दिन प्रकट होनेवाला आदिशक्ति का रूप “*ब्रह्मचारिणी*” ! – ब्रह्मचारिणी यह देवी सती का अविवाहित रूप है। देवी ब्रह्मचारिणी ने सहस्त्रों वर्ष कठिन तपश्चर्या की । देवी ने संसार के सामने ईश्वर प्राप्ति के लिए अखंड साधना करके अविरत साधना का अति उत्तम आदर्श रखा है।
*चंद्रघंटा* यह आदिशक्ति का तीसरे दिन प्रकट होनेवाला रूप ! – देवी चंद्रघंटा यह पार्वती का विवाहित रूप है । देवी पार्वती का शिव से विवाह होने के बाद देवी ने अपने मस्तक पर घंटा रूप में अलंकार अर्थात गहने के रूप में चंद्र धारण किया है। देवी चंद्रघंटा भक्तों के जीवन के दुख दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं । देवी उनके भक्तों के जीवन से भूत, प्रेत एवं पिशाच बाधा दूर करती हैं।
*कूष्मांडा* आदिशक्ति का नवरात्रि के चौथे दिन प्रकट होनेवाला रूप ! कूष्म अर्थात स्मित हास्य ! कूष्मांडा अर्थात केवल अपने स्मितहास्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करनेवाली । जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था एवं सर्वत्र अंधकार था उस समय देवी ने कूष्मांडा रूप में केवल हास्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। कुष्मांडा देवी को भूरे कुम्हडे की बलि अत्यंत प्रिय है । कूष्मांडा देवी भक्तों के रोग एवं शोक दूर करनेवाली एवं आयुष्य वृद्धि करनेवाली देवी हैं ।
आदिशक्ति देवी का नवरात्रि के पांचवें दिन प्रकट होने वाला *स्कंदमाता* रूप ! – बाल रूप कार्तिकेय को गोद में ली हुई आदिशक्ति ज्ञानदायिनी होने के कारण उनका स्कंदमाता यह ज्ञान स्वरूप है। देवताओं के सेनापति अर्थात कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है । स्कंद माता अर्थात कार्तिकेय की माता । इस रूप में स्कंदमाता ने बाल रूप के कार्तिकेय को स्वरूप का ज्ञान दिया, इसलिए वह ज्ञान स्वरूपिणी हैं।
नवरात्रि के छठवें दिन प्रकट होनेवाला आदिशक्ति का भय, शोक दूर करनेवाला “*कात्यायनी*” रूप ! – महर्षि कत के पुत्र कात्य ऋषि एवं कात्य ऋषि के पुत्र महर्षि कात्यायन। महर्षि कात्यायन की इच्छा थी कि देवी उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। इसलिए उन्होंने आदिशक्ति की कठोर तपश्चर्या की थी । भवानी, चामुंडा यह सब कात्यायनी देवी के ही रूप हैं।
नवरात्रि के सातवें दिन प्रकट होनेवाला आदिशक्ति का *कालरात्रि* रूप अर्थात शुभंकरी ! – नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है । कालरात्रि का रूप भयंकर है, परंतु वह सदैव शुभ फल देनेवाली हैं। देवी का यह रूप देखकर सभी दानव, भूत प्रेत आदि डरते हैं । कालरात्रि देवी की उपासना करने से ग्रह पीडा, अग्निभय, जल भय, जंतु भय एवं शत्रु भय दूर होता है ।
नवरात्रि के आठवें दिन प्रकट होने वाला आदिशक्ति का *महागौरी* रूप ! – शिव पति रूप में प्राप्त हों इसलिए देवी द्वारा की गई कठोर तपस्या से उनका शरीर काला पड़ गया, शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें पवित्र गंगाजल से नहला दिया, तब देवी का गौर रूप दिखने लगा, इसलिए उसे महागौरी कहा जाता है। आदिशक्ति उनके महागौरी रूप में भक्तों के ताप, पाप एवं संचित धो डालती हैं, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
आदिशक्ति का *योग माया* स्वरूप एवं उन्होंने किया हुआ असुरों का संहार ! – अष्टमी यह तिथि आदिशक्ति से संबंधित है । कृष्ण अष्टमी को श्री कृष्ण के जन्म से पहले आदिशक्ति स्वयं योग माया के रूप में जन्म लेती हैं । योग माया अर्थात जगत जननी। उसकी माया अनंत एवं अवर्णनीय है । यही योग माया श्री विष्णु के श्री राम अवतार के समय सीता बनकर आई एवं रावण असुर के बंधन में रहीं । आदिशक्ति योग माया की सहायता से श्री विष्णु ने मधु एवं कैैटभ इन असुरों का नाश किया ।
नवरात्रि के नौवे दिन प्रकट होने वाला आदिशक्ति का *सिद्धिदात्री* रूप ! – अष्ट महासिद्धि प्राप्त एवं भक्तों की लौकिक एवं पारलौकिक इच्छाएं पूर्ण करनेवाली देवी सिद्धिदात्री की नवरात्रि के नौवें दिन पूजा की जाती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व एवं वशित्व यह आठ सिद्धियां हैं। वह मोक्ष दायिनी हैं । ऐसी मोक्षदायिनी सिद्धिदात्री देवी के चरणों में कोटिशः नमन !
महामाया आदि शक्ति को शरण जाना यही एक मात्र मार्ग होना ! – मनुष्य रूप में देवता अथवा असुर इनको ना पहचान पाना यह भी आदिशक्ति की योग माया है। आज हम कलियुग में हैं । अन्य युगों की अपेक्षा यह युग कठिन है एवं स्थूल है। इस युग में भगवान ने मनुष्य रूप में अवतार लिया अथवा असुर मनुष्य रूप में है, यह समझना कठिन है।
सब कुछ आदिशक्ति की इच्छा से होता है इसलिए उसकी शरण जाना यही एकमात्र मार्ग होना – कुछ लोगों के मन में प्रश्न आता है कि सबकुछ आदिशक्ति की इच्छा से ही होता है तो हम परिश्रम क्यों करें ? हम काम क्यों करें? इसका उत्तर भी आदिशक्ति ही हैं । हम शांत बैठे ऐसा सोचें तो भी हम शांत बैठ नहीं सकते। येन केन प्रकारेण आदि शक्ति हम सबसे कार्य करवा ही लेती हैं । कर्म करते रहना एवं आदिशक्ति के शरण जाना इतना ही हम कर सकते हैं। मैं कर्म ही नहीं करूंगा ऐसा कहना अयोग्य है। जो कर्म हमें मिला है वह कर्म योग्य प्रकार से करने की शक्ति हमें प्राप्त हो ऐसी उस जगत जननी आदिशक्ति के चरणों में प्रार्थना है।
उस आदिशक्ति की अनन्य भाव से भक्ति करने के नौ दिन अर्थात नवरात्रि। आदिशक्ति की कृपा सब पर समान रहती है, परंतु जिसकी जैसी भक्ति उसे वैसे देवी की कृपा प्राप्त होती है।











