मुमुक्षु शीलकुमार एवं मुमुक्षु संयमकुमार की भागवती दीक्षा 11 फरवरी को भिवंडी में

भीलवाड़ा/भिवंडी। जैन धर्म की तपस्वी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मुमुक्षु शीलकुमार एवं मुमुक्षु संयमकुमार की भागवती दीक्षा बुधवार, दिनांक 11 फरवरी 2026 को तपोवन विद्यालय, भिवंडी में विधिवत रूप से संपन्न होगी। यह पावन अवसर जैन समाज के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।
जुड़वा भाई, छोटी आयु में बड़ा संकल्प
मुमुक्षु शीलकुमार एवं मुमुक्षु संयमकुमार दोनों सगे जुड़वा भाई हैं। इनकी आयु मात्र 9 वर्ष है, लेकिन वैराग्य, तप और संयम के प्रति इनकी दृढ़ आस्था सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। ये कच्छ लाखापुर–माटुंगा निवासी श्रीमती रसीलाबेन विनोदभाई शेठिया के दोहिते तथा सोनल परेशभाई दलवी (लंदन/मुंबई) के जुड़वां सुपुत्र हैं।

गुरुदेव के सान्निध्य में दीर्घ प्रशिक्षण
दोनों बालक कई वर्षों से गुरुदेव के सान्निध्य में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। बीते डेढ़ वर्ष से वे मुमुक्षु रूप में विशेष प्रशिक्षण ले रहे थे। इस अवधि में उन्होंने संयम, अनुशासन, तप और साधना के मार्ग पर स्वयं को पूरी तरह समर्पित किया। उच्च स्तर का प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद ही गुरुदेव द्वारा दीक्षा की अनुमति प्रदान की गई।
परिवार की धार्मिक परंपरा
इनकी बड़ी बहन पहले ही दीक्षा ग्रहण कर चुकी हैं, जिनका दीक्षित नाम साध्वीजी श्री सिद्धिवर्धनाश्रीजी है। यह परिवार की गहरी धार्मिक आस्था और संस्कारों को दर्शाता है।
पिता परेशभाई दलवी महाराष्ट्रीयन दलवी परिवार से होने के बावजूद तथा माताजी सोनलबेन के साथ मिलकर आदर्श श्रावक-श्राविका का जीवन जीते हुए बच्चों में श्रेष्ठ संस्कारों का रोपण किया है।
1000 किलोमीटर से अधिक का विहार
दीक्षा से पूर्व दोनों मुमुक्षुओं ने गुरुदेव के साथ रहकर लगभग 1000 किलोमीटर का विहार किया है। इस विहार के दौरान उन्होंने साधना, संयम और सेवा के वास्तविक अर्थ को निकट से समझा, जिससे उनका संकल्प और अधिक दृढ़ हुआ।
आचार्य श्री के चरणों में जीवन समर्पण
सांसारिक पक्ष से कच्छ वांकी एवं मालाड निवासी ये दोनों मुमुक्षु परम पूज्य आचार्य श्री हेमप्रभसूरीश्वरजी महाराज के चरणों में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करेंगे। उनकी भागवती दीक्षा जैन समाज के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय मानी जा रही है।
यह दीक्षा समारोह न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि सच्चे संस्कार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से अल्प आयु में भी उच्च आत्मिक लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं।
















