“मोबाइल मेरा, सिम मेरी… तो इनकमिंग कॉल पर ताला क्यों?”

Raghav Chadha का सवाल बना राष्ट्रीय बहस: सोशल मीडिया पर मचा बवाल
देश की राजनीति और जनजीवन से जुड़े मुद्दों में अक्सर महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की चर्चा होती है, लेकिन इस बार बहस का केंद्र बना है एक ऐसा विषय जो सीधे हर घर, हर हाथ और हर जेब से जुड़ा है—मोबाइल फोन की इनकमिंग कॉल। सोशल मीडिया पर राघव चड्ढा की फोटो के साथ वायरल एक बैनर पोस्ट में लिखा गया—“मोबाइल मेरा, सिम मेरी… तो इनकमिंग कॉल पर ताला क्यों?”
पोस्ट के अनुसार उन्होंने सवाल उठाया कि रिचार्ज समाप्त होने पर आउटगोइंग कॉल बंद होना समझ में आता है, लेकिन इनकमिंग कॉल भी बंद कर देना किस तर्क से सही ठहराया जा सकता है? यह सवाल केवल एक नेता का बयान नहीं रहा, बल्कि लाखों मोबाइल उपभोक्ताओं की सामूहिक आवाज बन चुका है।

यह मुद्दा अब एक सामान्य शिकायत नहीं, बल्कि जनआंदोलन की मांग का रूप ले रहा है—इनकमिंग कॉल को फिर से पूरी तरह मुफ्त और निर्बाध किया जाए।
बदलते दौर में बदलती टेलीकॉम नीतियां
एक समय था जब भारत में मोबाइल फोन का प्रसार शुरू ही हुआ था। कॉल दरें ऊंची थीं, लेकिन धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा बढ़ी और दरें कम होती गईं। उस दौर में इनकमिंग कॉल मुफ्त हुआ करती थी। उपभोक्ता को केवल आउटगोइंग कॉल के लिए भुगतान करना पड़ता था।
मोबाइल धारक निश्चिंत रहता था कि यदि बैलेंस खत्म भी हो जाए, तब भी कोई उसे कॉल कर सकता है। नौकरी की सूचना, अस्पताल से खबर, बैंक से OTP, परिवार से आपातकालीन संदेश—सभी बिना बाधा मिलते थे।
लेकिन समय के साथ टेलीकॉम कंपनियों ने वैधता आधारित प्लान लागू किए। अब यदि रिचार्ज की वैधता समाप्त हो जाए, तो न केवल आउटगोइंग बल्कि इनकमिंग कॉल भी बंद हो जाती है। मोबाइल हाथ में रहते हुए भी वह “साइलेंट” हो जाता है।
यह बदलाव तकनीकी नहीं, बल्कि व्यावसायिक नीति का परिणाम है। और यही नीति आज सवालों के घेरे में है।
28 दिन की वैधता: गणित जो उपभोक्ता पर भारी
महीने में 30 या 31 दिन होते हैं। फिर भी अधिकतर प्रीपेड प्लान 28 दिन की वैधता के साथ आते हैं। इसका अर्थ है कि उपभोक्ता को वर्ष में 12 नहीं, बल्कि 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है।
यह एक छोटा सा अंतर प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब इसे करोड़ों ग्राहकों पर लागू किया जाए तो यह अतिरिक्त राजस्व में बदल जाता है।
एक दिहाड़ी मजदूर, जिसकी रोज़ की कमाई सीमित है, उसे हर महीने यह चिंता रहती है कि रिचार्ज की तारीख न निकल जाए। यदि एक दिन भी चूक हो गई तो मोबाइल निष्क्रिय हो जाएगा।
यह केवल आर्थिक गणना नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा का प्रश्न है।
दिहाड़ी मजदूर और निम्न आय वर्ग की मजबूरी
भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो रोज कमाते हैं और रोज खर्च करते हैं। उनके लिए मोबाइल फोन विलासिता नहीं, बल्कि रोज़गार का साधन है।
- ठेकेदार काम पर बुलाने के लिए कॉल करता है।
- खेत मालिक मजदूर को सूचना देता है।
- फैक्ट्री सुपरवाइजर शिफ्ट की जानकारी देता है।
यदि इनकमिंग कॉल बंद हो जाए, तो काम का अवसर हाथ से निकल सकता है।
ऐसे लोगों के लिए हर महीने रिचार्ज केवल सुविधा नहीं, बल्कि मजबूरी है। यदि एक सप्ताह आय रुक जाए, तो सबसे पहले मोबाइल रिचार्ज ही प्रभावित होता है। और उसी के साथ संचार भी ठप हो जाता है।

बुजुर्गों और ग्रामीण भारत की हकीकत
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लाखों लोग केवल कॉल के लिए मोबाइल रखते हैं। इंटरनेट या डेटा उनके लिए आवश्यक नहीं है।
बुजुर्ग माता-पिता गांव में रहते हैं। बच्चे शहरों में नौकरी करते हैं। यदि वैधता समाप्त हो जाए और इनकमिंग कॉल बंद हो जाए, तो परिवार के बीच संपर्क टूट जाता है।
हर व्यक्ति को डेटा पैक की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी अधिकांश प्लान डेटा के साथ ही आते हैं। बिना डेटा वाला सस्ता, केवल कॉलिंग और एसएमएस आधारित प्लान दुर्लभ होता जा रहा है।
यह स्थिति डिजिटल असमानता को बढ़ाती है।
क्या इनकमिंग कॉल पर वास्तव में लागत आती है?
तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो इनकमिंग कॉल का नेटवर्क संसाधन उपयोग सीमित होता है। उपभोक्ता कॉल रिसीव करता है; कॉल करने वाला पहले ही भुगतान कर रहा होता है।
प्रश्न यह उठता है कि जब आउटगोइंग कॉल का शुल्क कॉल करने वाला देता है, तो रिसीवर की सेवा पूरी तरह बंद क्यों कर दी जाए?
यह नीति उपभोक्ता के मूल संचार अधिकार पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
सामाजिक प्रभाव: मोबाइल अब आवश्यकता है
मोबाइल आज पहचान, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी योजनाओं—सबका माध्यम बन चुका है।
- आधार OTP
- बैंक ट्रांजेक्शन
- सरकारी योजनाओं की सूचना
- अस्पताल की अपॉइंटमेंट
यदि इनकमिंग कॉल बंद हो जाए, तो व्यक्ति प्रशासनिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग पड़ सकता है।
इसलिए यह केवल व्यावसायिक सेवा का विषय नहीं, बल्कि नागरिक सुविधा का प्रश्न है।
जनभावना का उभार
सोशल मीडिया पर हजारों टिप्पणियां सामने आई हैं:
- “हमारी सुनता कौन है?”
- “हर महीने रिचार्ज का बोझ बढ़ रहा है।”
- “इनकमिंग तो कम से कम मुफ्त होनी चाहिए।”
- “28 दिन की जगह 30 दिन की वैधता हो।”
यह प्रतिक्रियाएं किसी राजनीतिक दल तक सीमित नहीं हैं। यह आम नागरिक की आवाज है।
लोग इसे लूट और शोषण की नीति मानते हैं।
एक जन आंदोलन की दिशा
यह मुद्दा अब व्यक्तिगत शिकायत नहीं रहा। यह सामूहिक मांग में बदल रहा है:
- इनकमिंग कॉल को पूरी तरह मुफ्त और निर्बाध किया जाए।
- 28 दिन की वैधता की जगह 30 या 31 दिन की वैधता लागू की जाए।
- बिना डेटा वाले सस्ते कॉलिंग प्लान उपलब्ध कराए जाएं।
यह मांग केवल उपभोक्ता सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के लिए है।
सरकार की भूमिका
भारत सरकार संचार क्षेत्र की सर्वोच्च नीति निर्माता है। यदि किसी टैक्स, लाइसेंस शुल्क या नीति परिवर्तन के कारण कंपनियों ने इनकमिंग कॉल पर रोक लगाई है, तो सरकार को समीक्षा करनी चाहिए।
मोबाइल संचार अब मूलभूत सुविधा बन चुका है। जिस प्रकार बिजली, पानी और सड़क को आवश्यक सेवा माना जाता है, उसी प्रकार न्यूनतम संचार सुविधा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सरकार को चाहिए कि वह टेलीकॉम कंपनियों के साथ चर्चा कर ऐसी नीति बनाए जिससे:
- न्यूनतम इनकमिंग सेवा हमेशा चालू रहे।
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राहत मिले।
- वैधता अवधि उपभोक्ता हित में हो।
आर्थिक तर्क बनाम सामाजिक दायित्व
कंपनियां लाभ के लिए कार्य करती हैं, लेकिन जब सेवा करोड़ों नागरिकों के जीवन से जुड़ी हो, तो सामाजिक दायित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
इनकमिंग कॉल को मुफ्त रखना कंपनियों के लिए असंभव नहीं है। यह पहले संभव था।
आज जब तकनीक उन्नत है, नेटवर्क व्यापक है, और ग्राहक आधार विशाल है, तब यह और भी संभव होना चाहिए।
आवाज जो रुकनी नहीं चाहिए
“मोबाइल मेरा, सिम मेरी… तो इनकमिंग कॉल पर ताला क्यों?”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक प्रश्न है जो हर भारतीय के मन में उठ रहा है।
जब मोबाइल जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, तब न्यूनतम संचार सुविधा से वंचित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
यह समय है कि नागरिक अपनी आवाज संगठित करें। यह समय है कि सरकार और कंपनियां उपभोक्ता हित को प्राथमिकता दें।
इनकमिंग कॉल को फिर से मुफ्त और निर्बाध बनाना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का कदम होगा।
देश की करोड़ों आवाजें अब यही मांग कर रही हैं—
इनकमिंग कॉल पर लगा ताला हटाया जाए।











