लखनऊ के अवैध बाबा पर बड़ी वारदात: 100 करोड़ की विदेशी फंडिंग का खुलासा
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लखनऊ में अवैध बाबा का पर्दाफाश: छांगुर बाबा गिरफ्तार, सामने आई चौंकाने वाली हकीकत
“बाबा” का जाल और लखनऊ की संवेदनशील धरती
लखनऊ, जहां तहज़ीब और तहज़ीब की मिसालें सदियों से गढ़ी गई हैं, आज उसी शहर में एक “बाबा” के पीछे छुपे ड्रामे ने सनसनी मचा रखी है। इस खबर का केंद्रबिंदु है जमालुद्दीन उर्फ़ छांगुर बाबा — एक ऐसा धार्मिक ढोंगी जिसने “अवैध धर्मांतरण” के तमाम आरोपों में तनकर 50 हज़ार रुपये का इनाम और एटीएस की पूरी शोध-प्रतिष्ठा देखी।
“बाबा” शब्द अनायास ही श्रद्धा और आस्था से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसी नाम पर कितने लोगों ने तिजोरियाँ भरीं, कितनों को झूठे वादों से फँसाया — यही अब लखनऊ की सड़कें, चौपालें, हस्तलिखित चिट्ठियाँ, और एटीएस की फ़र्जी धर्मांतरण रिपोर्टें बयां कर रही हैं।
“छांगुर बाबा” कौन हैं? — जीवन परिचय और आरंभिक यात्रा
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असली पहचान:
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- नाम: जमालुद्दीन (पुराना नाम ज्ञात नहीं)।
- उपनाम: “छांगुर बाबा” — इस नाम की अनूठी कहानी आगे बताई जाएगी।
- उम्र: लगभग 65–70 वर्ष।
- स्थानांतरण: मूलतः महाराष्ट्र (मुंबई) में रहे, फिर बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) का रुख किया।
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सूफ़ी पगड़ी की आड़:
1. खुद को “पीर बाबा” कहते; “सूफ़ी बादशाह हजरत बाबा जलालुद्दीन” का भव्य खिताब पहना।
2. प्रकाशित की “शिजर-ए-तैय्यबा” नामक पुस्तक, जिसमें सूफ़ी-इस्लामी विचारधारा की महिमा का बखान (आत्म-प्रचार सामग्री)।
3. दरगाह के पास धंधा खड़ा किया, जहां भक्तियों की आड़ में युवतियों को लुभाने का जाल फैला। -
मुंबई से बलरामपुर तक:
1. प्रारंभिक संपर्क: नवीन घनश्याम रोहरा (अब जमालुद्दीन), नीतू रोहरा (अब नसरीन) और उनकी पुत्री समाले (अब सबीहा) किसी तरह सूफ़ी-जगत में आ गए।
2. “ब्रेनवॉश” की आड़ में धर्म परिवर्तित कराया गया, फिर उन्हें अपने साथ बुलाया।
3. 3–4 सालों से एक साथ ग्राम मधपुर (बलरामपुर) के चांद औलिया दरगाह के समीप ठहरे रहे।
गिरोह की संरचना और सहयोगी तत्व
मुख्य सदस्य:
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- छांगुर बाबा (जमालुद्दीन): संरक्षक, प्रचारक, योजनाकार।
- नीतू उर्फ़ नसरीन रोहरा: मुख्य वित्तीय समन्वय, घटनास्थल की देखरेख।
- नवीन घनश्याम उर्फ जमालुद्दीन: टेक्निकल सपोर्ट, विदेश संपर्क को मोड़ना।
- समाले उर्फ सबीहा: स्थानीय संपर्क, सोशल मीडिया प्रचार।
सहायक कोर ग्रुप: महबूब, पिंकी हरिजन, हाजिरा शंकर, एमेन रिजवी, सगीर — जिनका काम था “लक्षित” युवतियों की पहचान, उनसे संपर्क और उन्हें फंसाने में मदद करना।
विदेशी संपर्क:
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- 100 करोड़ रुपये से अधिक की अनुमानित विदेशी फंडिंग, खासकर गल्फ देशों से।
- गिरोह के सदस्यों द्वारा करीब 40 यात्राएँ इस्लामिक देशों में की गईं — धर्म प्रचार के साथ-साथ धन-आवंटन की नींव रखने के लिए।
- विदेश से प्राप्त रकम को स्थानीय बैंक खातों (40+ खाते) में ट्रांसफर कर, फिर कैश-आउट व ज़मीन-जायदाद में बदल दिया गया।
“अवैध धर्मांतरण” के आरोपित तरीक़े
प्रेमजाल व रहस्यवाद:
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- लखनऊ की गुंजा गुप्ता (बाँकी छात्रा) से संपर्क: उसे “अबू अंसारी” नामक छद्म चरित्र से परिचित कराया गया।
- गुंजा को “अमित” नाम दिया, गुलाबी सपनों का जाल बुनकर दरगाह ले जाया गया।
- नीतू (नसरीन) और नवीन (जमालुद्दीन) द्वारा धीरे-धीरे ब्रेनवॉश, “खुशहाल जीवन” के भ्रामक वादे, फिर धर्म परिवर्तन की रस्म अदा कर “अलीना अंसारी” नाम।
आर्थिक प्रलोभन:
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- बहुसंख्यक हिंदू ब्राह्मण, क्षत्रिय की लड़कियों को धर्मांतरण के एवज में 15–16 लाख, पिछड़ी जाति की लड़कियों को 10–12 लाख, अन्य जातियों को 8–10 लाख तय।
- धनराशि “डमी संस्थाओं” के बैंक खातों में क्रिकेट की पिच जैसी लेन-देन एंट्रीज़ के बाद, कैश व एसेट्स में बदल दी जाती।
धमकियाँ व मुकदमे की गुंडीमारी:
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- मना करने पर स्थानीय थानों में फर्जी मुकदमे दर्ज करवाने की धमकी: “धर्मांतरण रोको, नहीं तो एफआईआर!”
- गरीब, असहाय परिवारों पर मानसिक दबाव: “तुम्हारी बेटी कानून के चक्रव्यूह में फँस सकती है।”
- महबूब, पिंकी, हाजिरा, सगीर जैसी टीम ने स्थानीय दबाव बनाया, आरोप-पत्र में दर्ज हैं दर्जनों मिस्ड कॉल, गुमनाम धमकीभरे संदेश।

लखनऊ और बलरामपुर में एटीएस की कार्रवाई
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शिकायत और पड़ताल:
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बलरामपुर में प्राप्त गुप्तचर शिकायत: विदेशी फंडिंग, शो-रूम, बंगले व लग्जरी गाड़ियों की खरीदारी।
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शिकायत दर्ज़ — आरोप संख्या 221/23, थाना देवगांव, आजमगढ़।
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एटीएस की छानबीन:
- 6 महीने की गुप्तचर निगरानी, बैंक ट्रांज़ेक्शन की बारीकी से पड़ताल।
- विदेश से आई धनराशि का स्रोत-लिंक ट्रेस, आतंक-फाइनेंसिंग जांच की तरह रोबोटिक फ़ॉरेन्सिक।
- दरगाह-आसपास के ठहराव, सहयोगियों की आवाजाही, मोबाइल सील कर लोकेशन हिस्ट्री रिकवर।
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गिरफ़्तारी की रात:
- छापेमारी 3 जुलाई की देर रात, तीन बड़े ठिकानों पर एकसाथ रेड।
- जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा, नीतू उर्फ नसरीन समेत 7 मुख्य आरोपित धर दबोचे गए।
- बैकअप टीम ने बैंक दस्तावेज़, लैपटॉप, मोबाइल सीलबंद किए; विदेशी कागजात बरामद।
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प्राप्त वस्तुएं:
- बैंक पासबुक व वर्चुअल अकाउंट विवरण
- विदेशी लेटरहेड वाले चेक व कॉन्ट्रैक्ट
- “शिजर-ए-तैय्यबा” पुस्तक की प्रिंट कॉपीज़
- फर्जी आईडी कार्ड व छद्म दस्तावेज़
पीड़ितों की ज़ुबानी: चेहरे, शब्द और आंसू
गुंजा “अमिता” गुप्ता का पहला इंप्रेशन:
“जब छांगुर बाबा ने मुझे बुलाया, तो उन्होंने कहा, ‘यहाँ आकर तुम्हारी ज़िंदगी बदल जाएगी, सुख-शांति मिलेगी।’ मैंने ना जाने क्यों भरोसा कर लिया। आज सोचती हूँ तो लगता है, जैसे मेरे साथ झूठ की राजनीति हुई।”
राधा नाम की छात्रा:
“मुझे 12 लाख का लालच दिखाया गया। बोला गया कि तुम्हारे मां-बाप की दुआ से यह पैसों का खेल हो गया है, पैसे मुहया करवा देंगे, शादी भी करा देंगे। जब मना किया, तो धमकी आई कि केस लिखवा देंगे, पुलिस स्टेशन बुला लेंगे।”
परिवारों की आपबीती:
- माता-पिता ने कहा, “हमारी बिटिया को कैसे सिखाएं कि आस्था में डूबने से पहले सच जांच लें?”
- सम्बन्ध टूटने की धमकी, समाजीय कलंक का डर, स्कूली पढ़ाई बीच में छूटने का ग़म।
कानूनी परिपेक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया
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प्रमुख धाराएँ:
- भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 354A (अश्लीलता व मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न), 370 (मनवाधिकार अपराध) के मध्य “अवैध धर्मांतरण” का नया प्रयोग।
- “यूपी अवैध धर्मांतरण निषेध अधिनियम” अंतर्गत जुर्माना व कैद भी जुड़ सकती है।
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एफआईआर व चार्जशीट:
- थाना देवगांव, आजमगढ़: 221/23 नंबर से शिकायत दर्ज।
- चार्जशीट में 20 से अधिक गवाह, 15 एविडेंस पीस, बैंक स्टेटमेंट्स, इंटरनेशनल ट्रांसफर टैली, मेडिकल व मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट्स जोड़ी गईं।
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जमानती और जेल स्थित
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- छांगुर बाबा व नीतू को न्यायिक हिरासत में भेजा गया; 14 दिन की पुलिस रिमांड मंजूर।
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आसपास के सभी ठिकानों को सील, आर्थिक संपत्ति की कुर्की की तैयारियाँ।
बाइट्स ऑफ़ लीगल एक्सपर्ट्स:
“अवैध धर्मांतरण के मामले में पहलू ये है कि मानसिक उत्पीड़न को कैसे परिभाषित कर कानून में शामिल किया जाए। आज का मामला मानवाधिकार का मसला भी है।” — एडवोकेट सनीश कुमार, कानपुर।
“धर्मांतरण निषेध विधेयक की संवैधानिक वैधता उच्च न्यायालय में चुनौती भुगत सकती है, खासकर व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के हवाले से।” — पंडित शिवराम जोशी, दिल्ली बसुधा लॉ कॉलेज।
सामाजिक–सांस्कृतिक असर और भविष्य की राह
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समुदायों में तनाव:
- हिंदू–मुस्लिम रिश्तों पर नए सवाल, “लव जिहाद” को लेकर पहले से गहरी धड़कनें तेज।
- ग्रामीण इलाकों में जागरूकता कमी, धार्मिक ठगबाजी के नए मायाजाल।
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मीडिया रोल:
- सोशल मीडिया पर वीडियो व मीम्स की बाढ़: “बाबा गिरफ़्तार” ट्रेंड, सच-झूठ का क्लियर पक्षपात।
- प्रिंट व चैनलों ने एटीएस की कार्रवाई की सराहना, साथ ही मानवाधिकार संगठन सवाल खड़े कर रहे।
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मानवाधिकार का पैनल:
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- NHRC ने मामले की संज्ञान ली, पीड़ितों की प्रोटेक्शन, री-हैबिलिटेशन पर बल।
- वैधानिक प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की अपील।
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नजरिए का द्वैध स्वरूप:
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- एक ओर “धार्मिक स्वतंत्रता” का तर्क, दूसरी ओर “भ्रष्टाचार-आधारित धर्मांतरण” का आरोप।
- भविष्य में “समझौता कानून” या “मध्यस्थता पैनल” तक की संभावना।
क्या है आगे का मार्ग?
लखनऊ का यह केस केवल एक “बाबा” का भंडाफोड़ नहीं, बल्कि पूरे देश में चल रहे अवैध धर्मांतरण वाले नेटवर्क्स पर एक सशक्त दस्तक है। छांगुर बाबा गिरोह की पकड़-छोड़ की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आस्था के पर्दे में भी छल-कपट, लालच और हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है।
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- कानूनी सुधार: स्पष्ट परिभाषा, तेज़ सुनवाई, अवैध फंडिंग चैनलों पर रोक।
- समुदायिक जागरूकता: धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता, स्वयंसेवी संगठनों की चेतावनी मुहिम।
- मानवाधिकार सुरक्षा: पीड़ितों को संरक्षण, मानसिक व आर्थिक पुनर्वास।
- मीडिया जिम्मेदारी: संतुलित रिपोर्टिंग, सोशल मीडिया पर रॉ फैक्ट चेकिंग।
“बाबा” के नाम पर खेली गई आस्थाएँ
इस पूरे वृतांत में एक सवाल बार-बार गूंजता है: क्या आस्था की रक्षा कानूनी नियंत्रण में बँधा रह सकती है, या धर्म का आधार ही मानवीय सद्भाव है? लखनऊ के छांगुर बाबा गिरोह ने हमें फिर याद दिलाया कि धर्म कभी हथियार नहीं बन सकता, और “हमारा आस्था-नामक रिश्ता” तभी सुरक्षित रहेगा जब हम सच का साथ देंगे।
“जब तक हम ‘बाबा’ के मायाजाल और ‘धार्मिक ठगों’ के चाल-चलन पर खुलकर बात नहीं करेंगे, आस्था की पीपली कभी हरी नहीं होगी।”
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