सेवा, समर्पण और विश्वास की जीत: श्री माणिक शाह तीसरी बार बने भारत जैन महामंडल के उपाध्यक्ष

जवाली। सामाजिक जीवन में कुछ उपलब्धियां केवल पद प्राप्त करने तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे व्यक्ति की वर्षों की निस्वार्थ सेवा, समर्पण और समाज के प्रति उसकी विश्वसनीयता का प्रमाण बन जाती हैं। भारत जैन महामंडल जैसी देश की प्रतिष्ठित एवं ऐतिहासिक संस्था, जिसकी स्थापना वर्ष 1899 में हुई थी, में लगातार तीसरी बार उपाध्यक्ष पद पर चयनित होना माणिक मूलचंद शाह (जवाली) की समाजसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है।
जैन समाज के चारों प्रमुख पंथों को एक सूत्र में पिरोने वाली इस राष्ट्रीय संस्था में पुनः यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलना इस बात का संकेत है कि श्री शाह ने अपने पूर्व कार्यकाल में संगठन की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए समाजहित में उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
माणिक शाह एक सफल उद्योगपति होने के साथ-साथ संवेदनशील समाजसेवी और भामाशाह के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रतीक है कि जब नेतृत्व में समभाव, सहयोग और सेवा की भावना होती है तो समाज स्वतः ऐसे व्यक्तित्व को आगे बढ़ाने का कार्य करता है। यही कारण है कि जैन समाज के विभिन्न वर्गों में उनकी पुनर्नियुक्ति को लेकर विशेष उत्साह और प्रसन्नता का वातावरण देखने को मिला तथा समाज के चारों पंथों की ओर से उन्हें हार्दिक बधाइयां दी गईं।
आज के समय में समाज को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो केवल पद की गरिमा न बढ़ाए बल्कि अपने कार्यों से समाज को नई दिशा भी दे। श्री माणिक शाह का चयन इस बात का संदेश देता है कि समाज हमेशा कर्मठ, ईमानदार और समर्पित व्यक्तियों को ही नेतृत्व सौंपता है।
उनकी यह उपलब्धि युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणास्रोत है कि यदि निष्ठा और सेवा भावना के साथ कार्य किया जाए तो समाज स्वयं सम्मान प्रदान करता है। जैन समाज और सहयोगियों की ओर से श्री माणिक शाह को इस महत्वपूर्ण दायित्व के लिए हार्दिक बधाई दी गई है तथा उनके तीसरे कार्यकाल के भी पहले और दूसरे कार्यकाल की तरह सफल एवं प्रेरणादायी रहने की कामना की गई है।
















