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बरजाल में मनाया गया वीर वरावत हालुजी रावजी का उत्सव

स्मारक स्थापना की 23वीं वर्षगांठ पर हुआ भव्य आयोजन


GOPAL SINGH KHOKHARA
REPORTER
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देवगढ़। देवगढ़ के समीपवर्ती गांव बरजाल में स्थित वीर हालुजी रावजी स्मारक पर वरावत हालुजी रावत स्मृति संस्थान बरजाल के तत्वावधान में स्मारक की 23वीं स्थापना वर्षगांठ अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता रावजी लाखनसिंह ने की, जबकि मुख्य अतिथि गिरधारी सिंह चौहान (प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान रावत राजपूत महासभा, ब्यावर) थे। कार्यक्रम में प्रशासक सुरेश सिंह बरजाल, आशूसिंह गहलोत पिपरेलु (प्रदेशाध्यक्ष, गहलोत महासभा), जयराम सिंह गहलोत (कीटो का बाड़िया) तथा प्रवक्ता माधुसिंह चौहान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत केसरिया ध्वज फहराने और जयकारों के साथ हुई, जिससे सम्पूर्ण वातावरण देशभक्ति और वीरता के भाव से गूंज उठा। इसके बाद वीर हालुजी रावत को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।

मुख्य वक्तव्य और ऐतिहासिक चर्चा
मुख्य वक्ता माधुसिंह चौहान ने हालुजी रावत के जीवन चरित्र, रहन-सहन, खानपान, व्यवसाय, और विशेष रूप से देवगढ़ के इतिहास एवं जावद (मध्यप्रदेश) की गणगौर से जुड़े प्रसंगों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राजस्थान विशेषकर मेवाड़ की धरती वीर योद्धाओं की भूमि रही है, जहाँ भीमटा जी रावत, राजु जी रावत, बाघा जी रावत जैसे अनेक वीरों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु बलिदान दिए।

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हालुजी रावत की वीरता की गाथा
हालुजी रावत एक स्वाभिमानी योद्धा थे, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में बरजाल की पहाड़ी पर बन रहे किले के निर्माण का विरोध किया। उनका मानना था कि ऊँचाई पर बना किला नीचे के निवासियों के लिए हानिकारक होगा। दिन में सामंत जिस किले का निर्माण कराते, हालुजी और उनके साथी रात में उसे तोड़ देते थे। अंततः सामंतों को हार माननी पड़ी और देवगढ़ की नींव 5 किलोमीटर दूर रखनी पड़ी।

लोककथाओं में अमर वीर
हालुजी रावत के साहस और स्वाभिमान को लोकगीतों में भी याद किया जाता है। उनके ऊपर कई कविताएं प्रचलित हैं जैसे:
“गढ़ चुनायो देवगढ़ रावजी, दियो अंबर से अड़ाए…”
“देवगढ़ की कामनिया यों कहे, मत छेड़ो हालुजी ने जाए…”

गणगौर का प्रसंग
एक बार भोजाई से हुए विवाद के बाद हालुजी ने बिना कुछ कहे, राजसी वस्त्र पहनकर जावद (म.प्र.) के गणगौर मेले में पहुंचकर वहां की गणगौर उठाकर ले आए। उनके घोड़े की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि सात बैलगाड़ियों को एक ही छलांग में पार कर लिया। यह प्रसंग उनकी वीरता और आत्मसम्मान का जीवंत उदाहरण है।

स्मारक की स्थापना
13 अप्रैल 2003 को वरावत हालुजी रावत स्मारक की स्थापना की गई, जो अरावली की पहाड़ी पर समुद्र तल से 420 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह स्मारक उदयपुर से 125 किमी उत्तर और अजमेर से 150 किमी दक्षिण में स्थित है। स्मारक की स्थापना मेजर फतेह सिंह रावत के मुख्य आतिथ्य में और तत्कालीन विधायक लक्ष्मण सिंह रावत की अध्यक्षता में हुई थी। उस अवसर पर हजारों की संख्या में समाजजन उपस्थित थे।

वक्ताओं के उद्बोधन
मुख्य अतिथि गिरधारी सिंह चौहान ने कहा कि “हमें अपनी आन-बान-शान के साथ जीवन जीना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रेरणा लेकर संस्कारी बने।”
जयराम सिंह गहलोत ने वीर मोटाकिट गहलोत की बहादुरी का उल्लेख किया।
आशूसिंह गहलोत ने कहा कि “महापुरुषों के बताए मार्ग पर चलकर ही समाज का विकास संभव है।”

उपस्थित गणमान्य व्यक्ति
इस अवसर पर मोट सिंह उपसरपंच, डालू सिंह महाराज, सोहन सिंह भोपाजी, हेम सिंह, रूप सागर सिंह, सरवन सिंह, पन्ना सिंह, प्रेम सिंह, सोनू सिंह, कर्म सिंह सहित अनेक ग्रामीणजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन माधुसिंह चौहान द्वारा किया गया।

न्यूज़ डेस्क

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