आद्याशक्ति : सृष्टि की सनातन धारा

नवरात्रि का समय है। चारों ओर देवी माँ के जयकारे गूंज रहे हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप, मंदिरों में बजती घंटियों की ध्वनि और दीपों की लौ मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती हैं, जिसमें हर भक्त का हृदय माँ की महिमा में डूब जाता है। यही तो वह क्षण है जब हम आद्याशक्ति के अद्वितीय रूपों और उनकी अनंत शक्तियों को समझने का प्रयास करते हैं।
तीन चरणों की साधना
कहा गया है कि नवरात्रि के पहले तीन दिन माँ महाकाली की उपासना की जाती है। वे तमोगुण को नष्ट कर साधक के भीतर साहस और शक्ति जगाती हैं। अगले तीन दिन महालक्ष्मी की पूजा होती है, जो रजोगुण को नियंत्रित कर जीवन में समृद्धि और संतुलन लाती हैं। अंतिम तीन दिन माँ महासरस्वती का स्मरण होता है, जिनकी कृपा से साधक को ज्ञान, विवेक और साधना का बल प्राप्त होता है।
इन तीनों रूपों को अपने में समेटकर जो शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड को गति देती है, वही है आद्याशक्ति।
आद्याशक्ति का रहस्य
महाकाली काल की प्रतीक हैं, जहाँ सबका अंत होता है। महासरस्वती गति का स्वरूप हैं, जिनके बिना सृष्टि की यात्रा ठहर जाएगी। महालक्ष्मी दिशा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो जीवन को सही मार्ग दिखाती हैं। यही तीनों तत्त्व मिलकर ब्रह्मांड के संचालन का आधार बनते हैं।
भले ही ये अलग-अलग रूपों में पूजी जाती हैं, पर वास्तव में वे एक ही शक्ति हैं – आदिशक्ति, महामाया, त्रिपुरा, त्रिपुरसुंदरी।
काली का अद्भुत स्वरूप
महानिर्वाण तंत्र कहता है कि काली अरूप हैं। जब वे सृजन करती हैं, तब लालिमा लिए रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। जब वे जगत को स्थिर करती हैं, तब सत्त्वगुणी गौरवर्णी रूप धारण करती हैं। और जब संहार करती हैं, तब श्यामवर्णी होकर तमोगुण का प्रतीक बन जाती हैं।
त्रिपुरा : धर्म, अर्थ और काम की अधिष्ठात्री
त्रिपुरा का नाम ही उनके स्वरूप का रहस्य खोलता है – जो धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों को साध्य कराए, वही त्रिपुरा है। कभी वे कुमारी रूप में पूजी गईं, तो कभी त्रिपुराबाला, त्रिपुरभैरवी और त्रिपुरसुंदरी के रूप में।
त्रिपुरसुंदरी : सौंदर्य और आनंद का धाम
त्रिपुरसुंदरी को पराशक्ति कहा गया है। उनका स्वरूप चंद्रमा की 16 कलाओं से जुड़ा है। पहली पंद्रह कलाएँ बदलती रहती हैं, पर सोलहवीं कला शाश्वत है। यही नित्यषोडशी रूप सौंदर्य और आनंद का धाम है, जिसे महात्रिपुरसुंदरी कहा गया है।
तीन महाशक्तियों का संग्राम
धर्मग्रंथ बताते हैं कि आद्याशक्ति ने ही दैत्यों का संहार कर धर्म की रक्षा की।
महाकाली ने मधु और कैटभ का वध किया।
महालक्ष्मी ने महिषासुर का संहार कर देवताओं को विजय दिलाई।
महासरस्वती ने शुंभ-निशुंभ जैसे दानवों का अंत किया।
नवरात्रि के इन नौ दिनों में आद्याशक्ति अपने तीनों स्वरूपों में साधकों को अलग-अलग संदेश देती हैं – पहले भय को जीतकर शक्ति प्राप्त करो, फिर जीवन को समृद्धि और संतुलन से सजाओ, और अंत में ज्ञान और साधना से आत्मा को मुक्त करो।
आखिरकार, आद्याशक्ति ही वह सनातन धारा हैं, जिनसे सृष्टि चलती है, और जिनमें ही अंततः सब विलीन हो जाता है।











