बेंगलुरु में भीषण आग: जालोर के व्यापारी का परिवार जिंदा जला
बेंगलुरु की काली रात: जालोर के परिवार की चीखें आग में दब गईं

नगरपेठ क्षेत्र में दर्दनाक हादसा, 6 लोगों की आग में जलने से मौत – घटना की पूरी रिपोर्ट
15 अगस्त की रात थी। पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था। कहीं आतिशबाज़ियाँ हो रही थीं, कहीं बच्चे हाथों में तिरंगा लिए झूम रहे थे। लेकिन इसी बीच बेंगलुरु के नगरपेठ इलाके की एक तंग गली में मौत अपने पंजे फैलाए बैठी थी।
चार मंजिला इमारत की चौथी मंजिल पर जालोर के मदन सिंह राजपुरोहित अपने परिवार के साथ रहते थे। उस रात उनकी पत्नी संगीता (35) और दोनों नन्हें बेटे विहान (8) व नीतेश (5) चैन की नींद सो रहे थे। बच्चों ने दिनभर स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल में तिरंगा फहराया था, कविताएँ गाई थीं। थके-मांदे होकर वे माँ की गोद में सिमटकर सो गए।
नीचे ग्राउंड फ्लोर पर मदन सिंह का गोदाम था। लकड़ी के बर्तनों के कारोबार से उन्होंने बेंगलुरु में अपनी पहचान बनाई थी। उस रात वे देर तक वहीं काम में जुटे थे। अचानक आधी रात को गोदाम से हल्की चिंगारी निकली। किसी ने सोचा भी नहीं था कि वही चिंगारी कुछ ही मिनटों में छह जिंदगियाँ लील जाएगी।
लकड़ी और प्लास्टिक से भरा गोदाम आग की लपटों से भर गया। आग सीढ़ियों से होती हुई ऊपर चढ़ी और चौथी मंजिल तक पहुँच गई। तभी रसोई में रखा गैस सिलेंडर धमाके के साथ फट पड़ा। पूरा इलाका दहल उठा। लोग घरों से बाहर भागे। चीखें गूँजने लगीं।
लेकिन चौथी मंजिल पर मदन सिंह का परिवार मौत के घेरे में फँस चुका था।
धुएँ और लपटों से घिरा कमरा, बंद दरवाज़ा और अंदर मासूम बच्चे… पत्नी ने बच्चों को गोद में समेटा, शायद उन्हें बचाने की कोशिश की। लेकिन ज़हरीले धुएँ ने उनके फेफड़े जला दिए। पड़ोसियों का कहना है कि उन्होंने खिड़कियों से मदद की पुकार सुनी थी—लेकिन आग की गर्मी और धुआँ इतना घना था कि कोई पास तक नहीं जा पाया।
मदन सिंह खुद गोदाम में ही फँस गए। वे शायद ऊपर परिवार तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आग की लपटों ने उन्हें वहीं निगल लिया। नीचे से लोग चिल्ला रहे थे, “दरवाज़ा खोलो! बाहर निकलो!” मगर ऊपर से कोई जवाब नहीं आया। कुछ ही देर में सब कुछ ख़ामोश हो गया।

इस हादसे में सिर्फ राजपुरोहित परिवार ही नहीं, बल्कि रानीवाड़ा (जालोर) का सुरेश कुमार (25) भी मौत के आगोश में चला गया। वह दूसरी मंजिल पर सो रहा था। गोदाम के दो कर्मचारी भी लापता हैं, जिनके जिंदा बचने की उम्मीद बहुत कम है।
फायर ब्रिगेड को बुलाया गया। 18 फायर टेंडर संकरी गलियों में रास्ता ढूँढते रहे। जब तक आग पर काबू पाया गया, तब तक जिंदगी राख में बदल चुकी थी। एसडीआरएफ टीम ने कई घंटे की मशक्कत के बाद जली हुई लाशें निकालीं। उस समय वहाँ मौजूद लोग रो पड़े। किसी की आँखों में गुस्सा था, किसी में बेबसी।
मदरान गाँव (जालोर) से आए इस परिवार की मौत की खबर सुनते ही गाँव में मातम छा गया। जहाँ कभी बच्चे हँसते-खेलते थे, अब रोने की आवाज़ें गूँज रही हैं। रिश्तेदारों का कहना है, “मदन मेहनती इंसान था, सबका ख्याल रखता था। उसने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसका परिवार इस तरह खत्म हो जाएगा।”
राजनीतिक हलकों में भी इस त्रासदी की गूँज सुनाई दी। पूर्व विधायक आर.वी. देवराजू ने घटनास्थल का दौरा कर जाँच का आश्वासन दिया। अशोक गहलोत ने ट्विटर पर शोक जताया। लेकिन सवाल वहीं खड़ा है—क्या यह मौतें टाली नहीं जा सकती थीं?
स्थानीय लोग कह रहे हैं कि अगर दमकल समय पर पहुँचती, अगर इमारत में फायर सेफ्टी इंतज़ाम होते, तो मासूम बच्चों की साँसें नहीं रुकतीं। मगर अब सबकुछ राख हो चुका है।
मृतकों का अंतिम संस्कार 17 अगस्त को बेंगलुरु में होगा।
उस वक़्त जब चिता पर मासूमों की लाशें रखी जाएँगी, शायद हर कोई यही सोचेगा—
“क्या हमारी लापरवाही की कीमत हमेशा मासूमों को जान देकर चुकानी पड़ेगी?”
“हम देख रहे थे, पर बचा न सके…” – बेंगलुरु की आग में जिंदा जले जालोर का परिवार
नगरपेठ की तंग गलियों में शुक्रवार देर रात वह मंजर किसी खौफनाक सपने जैसा था। आधी रात को जब लोग नींद में थे, अचानक धमाके की आवाज़ और धुएँ की गंध ने सबको जगा दिया। चार मंजिला बिल्डिंग में लगी आग ने देखते ही देखते सबकुछ बदल दिया।
पड़ोसियों की आँखों देखी
पड़ोस की रहने वाली मीना देवी की आँखें अब भी नम हैं। वे बताती हैं—
“हम नीचे खड़े होकर बार-बार चिल्ला रहे थे, ‘दरवाज़ा खोलो, बाहर आ जाओ!’ लेकिन ऊपर से सिर्फ बच्चों की चीखें सुनाई दे रही थीं। आग इतनी भयानक थी कि कोई सीढ़ियों तक जाने की हिम्मत नहीं कर पाया। हम देख रहे थे… पर कुछ कर न सके।”
एक और पड़ोसी रमेश कहते हैं—
“चौथी मंजिल की खिड़की से धुआँ निकल रहा था। अंदर बच्चे चिल्ला रहे थे। सब लोग दौड़े, पानी की बाल्टियाँ फेंकीं, लेकिन आग पर कोई असर नहीं हुआ। जब तक दमकल पहुँची, सब खत्म हो चुका था।”
गाँव में मातम
जालोर जिले के मोदरान गाँव में यह खबर जैसे ही पहुँची, पूरा गाँव स्तब्ध रह गया। मदन सिंह राजपुरोहित का घर अब सन्नाटे से भरा है।
गाँव के बुजुर्ग कहते हैं—
“मदन मेहनती और मिलनसार था। गाँव से निकलकर शहर में उसने व्यापार खड़ा किया। किसे पता था कि इतनी मेहनत करने वाला इंसान और उसका पूरा परिवार इस तरह खत्म हो जाएगा।”
मदन सिंह के रिश्तेदारों ने रोते हुए बताया—
“बस दो दिन पहले ही उसने फोन किया था, बच्चों की पढ़ाई और व्यापार के बारे में बताया था। उसकी आवाज़ अब भी कानों में गूंज रही है… यकीन नहीं होता कि सब चले गए।”
बचावकर्मियों की बेबसी
एसडीआरएफ के एक जवान ने बताया—
“हमने पूरा जोर लगाया, लेकिन जब तक मलबे से शव निकाले, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सबसे दर्दनाक पल था जब माँ और दोनों बच्चे एक-दूसरे से लिपटे हुए मिले।”
सवाल जो अब भी बाकी हैं
यह हादसा केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों के लिए आईना है।
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अगर बिल्डिंग में फायर सेफ्टी के इंतज़ाम होते तो क्या बच्चे बच जाते?
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अगर दमकल समय पर पहुँचती तो क्या इतने लोग जिंदा न जलते?
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और क्या हमारी शहरों की लापरवाहियाँ हमेशा मासूम जिंदगियों को निगलती रहेंगी?
शहर और गाँव में गहरा शोक
बेंगलुरु का राजस्थानी समाज अब भी स्तब्ध है। हर कोई यही कह रहा है—“ऐसी मौत किसी दुश्मन को भी न मिले।”
जालोर के मोदरान गाँव में मातम पसरा है। घर के आँगन में खेलते रहे बच्चों की हँसी अब हमेशा के लिए थम गई।















