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लकवाग्रस्त पिता को बेटों ने घर से निकाला, भाई बना आख़िरी सहारा

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जब अपने ही पराए बन गए: लकवे से जूझता पिता, समाज तथा प्रशासन से मदद की गुहार


कलयुगी बेटों द्वारा ठुकराया गया लकवाग्रस्त पिता, समाज और सरकार से मदद की आस

एक दर्दनाक सच्चाई जो हर संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर करती है

सादड़ी| प्रतापगढ़ जिले के बावरियों के झूंपा क्षेत्र का निवासी अंदाराम पुत्र मघाजी बावरी आज अपने ही जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है। यह लड़ाई किसी बीमारी से नहीं, बल्कि अपनों की बेरुखी और हालात की मार से है। कुछ समय पूर्व अंदाराम लकवाग्रस्त हो गया। इस बीमारी ने न केवल उसके शरीर को जकड़ लिया, बल्कि उसकी आवाज़ भी छीन ली। आज वह न तो ठीक से चल सकता है और न ही बोलकर अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकता है।

दुखद पहलू यह है कि जिस उम्र में एक पिता को अपने बेटों के सहारे और सेवा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उसी समय उसके अपने ही बेटों ने उसे घर से बाहर निकाल दिया। जिन बेटों को उसने पाल-पोसकर बड़ा किया, आज वही बेटे उसे बोझ समझने लगे। लकवाग्रस्त होने के बाद अंदाराम की देखभाल की बजाय उसे घर से निकाल देना मानवता को शर्मसार करने वाला कृत्य है।

इस अमानवीय व्यवहार के बाद अगर कोई सहारा बना तो वह हैं अंदाराम के छोटे भाई वेलाराम बावरी। वेलाराम ने भाई को बेसहारा छोड़ने की बजाय अपने घर में शरण दी। वर्तमान में अंदाराम मादा रोड स्थित गौशाला के पास अपने छोटे भाई के मकान में रह रहा है। वेलाराम का कहना है कि भाई की हालत बेहद दयनीय है। लकवा मारने के बाद वह पूरी तरह से बोलने में असमर्थ हो चुका है। उसकी जरूरतें इशारों और आंखों से समझनी पड़ती हैं।

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अंदाराम पुत्र मघाजी बावरी के भाई का मकान, जहा अंदाराम अभी रहता है

संघर्ष भरी दिनचर्या

अंदाराम की रोजमर्रा की जिंदगी बेहद संघर्षपूर्ण है। इलाज, दवाइयाँ, भोजन और देखभाल—सब कुछ दूसरों की दया पर निर्भर है। पड़ोस के कुछ संवेदनशील लोग मानवता निभाते हुए उसे कभी रोटी दे देते हैं, तो कभी हालचाल पूछ लेते हैं। यही लोग आज अंदाराम के लिए परिवार जैसे बन गए हैं। लेकिन यह मदद स्थायी नहीं है और न ही पर्याप्त।

भाई ने निभाया धर्म

वेलाराम स्वयं सीमित साधनों वाला व्यक्ति है। अपने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ लकवाग्रस्त भाई की देखभाल करना उसके लिए भी आसान नहीं है। फिर भी उसने रिश्ते का धर्म निभाते हुए भाई को सहारा दिया, जो आज के समय में एक मिसाल है। वहीं दूसरी ओर, अंदाराम के बेटों का व्यवहार समाज को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सचमुच कलयुग के उस दौर में पहुँच चुके हैं, जहाँ खून के रिश्तों की कोई कीमत नहीं रह गई?

यह मामला केवल पारिवारिक संवेदनहीनता का नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक चिंता का भी विषय है। अंदाराम जैसे कई बुजुर्ग और असहाय लोग समाज में हैं, जो बीमारी या लाचारी के कारण उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए सरकार की योजनाएँ कागज़ों तक सीमित न रहकर ज़मीन पर दिखनी चाहिए।

सरकार से अपेक्षा है कि अंदाराम जैसे पीड़ित व्यक्ति को वृद्धावस्था पेंशन, दिव्यांग पेंशन, निशुल्क इलाज, दवाइयाँ और देखभाल की समुचित व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए। यदि संभव हो तो किसी वृद्धाश्रम या सामाजिक देखभाल केंद्र से जोड़ा जाए, जहाँ उसे सम्मानजनक जीवन मिल सके।

साथ ही, सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और भामाशाहों से भी अपील है कि वे आगे आकर अंदाराम की मदद करें। भोजन, चिकित्सा, कपड़े और नियमित देखभाल जैसी बुनियादी जरूरतों की जिम्मेदारी कोई संस्था ले, तो एक टूटते हुए जीवन को सहारा मिल सकता है।

अंदाराम की कहानी एक चेतावनी है—कि अगर आज हम चुप रहे, तो कल यह कहानी किसी और की भी हो सकती है। समाज की असली पहचान तभी है, जब वह अपने सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ खड़ा हो। उम्मीद है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इस पीड़ित व्यक्ति के जीवन में फिर से कुछ राहत और सम्मान ला सकेंगे।

यह रिपोर्ट मानवीय सरोकारों और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित है 

न्यूज़ डेस्क

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