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बंक्यारानी माता मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ः नवरात्र में मेले जैसा माहौल; श्रद्धालुओं की मान्यता- यहां पूरी होती है सभी मनोकामनाएं

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भीलवाड़ा जिले के आसींद क्षेत्र के आमेसर के पास माताजी खेड़ा में स्थित माता बंक्यारानी का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। नवरात्र के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं। इस मंदिर में हनुमानजी, भगवान भैरव, और माता बंक्यारानी की ज्वाला माता का प्रमुख स्थान है। मंदिर के पास एक तालाब भी है।

खासकर शनिवार व रविवार और नवरात्र में यहां भारी भीड़ रहती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बंक्यारानी माता का मंदिर एक पहाड़ की चोटी पर स्थित है।

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यह मंदिर आसींद से 12 किलोमीटर दूर आसींद-शाहपुरा मार्ग पर स्थित है। मंदिर के पास बालाजी का एक और मंदिर भी है। हर नवरात्र में यहां मेले जैसा वातावरण बना रहता है। इस शक्ति स्थल पर सरकार द्वारा एक ट्रस्ट का गठन किया गया है। हर साल शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है।

बंक्यारानी पर बनी फिल्म

शक्ति स्थल की प्रेत बाधा चिकित्सा की विशेषताओं को लेकर ‘ऑयज शॉप स्टोन’ नाम से एक फिल्म बनाई गई थी, जो फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में गोल्ड मेडल से सम्मानित की गई। नवरात्र में शोधकर्ताओं, फिल्म निर्माताओं, गायकों, और कलाकारों का यहां आना-जाना लगा रहता है।

नवरात्र में विभिन्न राज्यों से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही बीमारी से पीड़ित रोगियों के आचार-विचार में परिवर्तन आ जाता है। नवरात्र के नौ दिनों तक कई परिवार यहां रहते हैं। महिलाएं एक किलोमीटर दूर स्थित हनुमान मंदिर तक जाती हैं, जहां कुंड में स्नान करने से उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होती है।

बंक्यारानी के प्रकट होने की कथा

मंदिर के पुजारी और ट्रस्टी देवीलाल ने बताया कि बंक्या माता ने बकेसुर राक्षस का वध कर बांके गढ़ में प्रकट हुई थीं। वहां से आकाश मार्ग से जा रही थीं, तभी बदनोर प्रांत के आमेसर के जंगलों में बाल गोपाल पशु चरा रहे थे। उन्होंने माता को देखा और जोर से पुकारा। माता भवानी ने उनकी पुकार सुनकर अपनी यात्रा स्थगित कर दी और वर्तमान में स्थापित मूर्ति वाली जगह पर आकर पाषाण रूप धारण किया।

कहा जाता है कि ईसरदास पंवार निसंतान थे, माता ने उन्हें पुत्र प्रदान किया। इसके बदले में उन्हें महिषासुर भैंसे की बलि देनी थी, लेकिन वह अपना वादा भूल गए। जब उनका बच्चा 12 वर्ष का हुआ, तो उसने अपने जन्मदिन पर कहा कि वह बंक्यारानी के समर्पण हेतु जा रहा है और उसने अपना शीश माता को अर्पित कर दिया।

जब परिवार वहां पहुंचा तो सोने की थाली में बच्चे का कटा हुआ सिर रखा था। मंदिर के बाहर कटे हुए धड़ पर सिर रखे हुए की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के पास ही एक किलोमीटर दूर आमेसर रोड पर हनुमान मंदिर स्थित है, जहां भक्त बिना दर्शन किए नहीं जाते।

भजन कीर्तन करते हैं भक्त

माता के दरबार में श्रद्धालुओं द्वारा भजन संध्या का आयोजन किया जाता है।

न्यूज़ डेस्क

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