मातृकुंडिया तीर्थ विशेष – राजस्थान का “छोटा हरिद्वार” मेवाड़ का “हरिद्वार ” है मातृकुंडिया

गुरलां (चित्तौड़गढ़, राजस्थान): राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले में स्थित गांव गुरलां धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्त्व का एक विशिष्ट केंद्र है। यहाँ से कुछ दूरी पर बनास नदी के किनारे स्थित है एक अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल — मातृकुंडिया, जिसे श्रद्धा से “मेवाड़ का हरिद्वार” कहा जाता है।

क्या आप जानते हैं? राजस्थान में है एक शहर जिसे कहा जाता है — “छोटा हरिद्वार”!
राजस्थान, जो अपनी शौर्य गाथाओं, महलों, किलों, और लोकसंस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, उसमें एक ऐसा पवित्र स्थान भी है जिसे लोग श्रद्धा से “छोटा हरिद्वार” कहते हैं।
यह स्थान है — मातृकुंडिया।
चित्तौड़गढ़ जिले में बनास नदी के तट पर बसे इस तीर्थस्थल को इसकी धार्मिक महत्ता, पौराणिक कथाओं, और शुद्ध आध्यात्मिक वातावरण के कारण यह उपनाम मिला है।
यह वही स्थान है जहाँ भगवान परशुराम, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, ने अपनी माता की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए तपस्या और प्रायश्चित किया था।
मातृकुंडिया में आज भी हजारों श्रद्धालु हर साल आकर पवित्र स्नान करते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, और मानसिक शांति की तलाश में यहां के दिव्य वातावरण में समय बिताते हैं।
इसलिए कहा जाता है —
“अगर उत्तर में हरिद्वार है, तो मेवाड़ में है उसका छोटा स्वरूप — मातृकुंडिया, ‘छोटा हरिद्वार’।”
आज भी यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में आकर पवित्र कुंड में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं और जीवन के कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। मातृकुंडिया न केवल धार्मिक दृष्टि से पूजनीय है, बल्कि यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्वितीय संगम भी है। गुरलां गांव और आसपास के क्षेत्र के लिए यह स्थल गौरव, श्रद्धा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

यह है मेवाड़ का “छोटा हरिद्वार” — मातृकुंडिया, जहां भगवान परशुराम ने पाया था पाप से मुक्ति का मार्ग!
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक स्थल है — मातृकुंडिया, जो बनास नदी के पवित्र तट पर बसा है।
यह स्थान केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि गहराई से पौराणिक आस्था से भी जुड़ा है।
मातृकुंडिया को भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुरामजी से जोड़ा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब परशुरामजी ने अपने पिता की आज्ञा पर अपनी माता रेणुका की हत्या की, तब इस पापकर्म से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने मातृकुंडिया के जल में स्नान किया और तपस्या की।
तब से यह स्थान मोक्ष, प्रायश्चित और शुद्धि का प्रतीक बन गया।
आज भी हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं, स्नान करते हैं और अपने जीवन के दोषों व दुखों से छुटकारा पाने की कामना करते हैं।
मातृकुंडिया सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि आस्था का जीता-जागता प्रमाण है — यही कारण है कि इसे कहा जाता है “मेवाड़ का छोटा हरिद्वार”।

















