रामस्नेही संप्रदाय में गुरु पूर्णिमा पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया

रामद्वारा खंबायत में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
बाली उपखंड क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध रामस्नेही संप्रदाय के सातवें खंबायत रामद्वारा में इस वर्ष गुरु पूर्णिमा पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भव्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें क्षेत्र भर से सैकड़ों श्रद्धालु महिलाओं व पुरुषों ने भाग लिया। रामद्वारा परिसर भक्ति रस और अध्यात्म से सराबोर हो गया।
गुरु महंत मुरली दास महाराज ने किया शिष्यों को प्रसाद वितरण
समारोह की अगुवाई कर रहे महंत मुरली दास महाराज ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतवर्ष में गुरु परंपरा अत्यंत प्राचीन है और गुरु पूर्णिमा उस परंपरा को श्रद्धापूर्वक स्मरण करने का पावन अवसर है। उन्होंने कहा कि शिष्य और गुरु का संबंध आत्मिक होता है, जिसमें केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन के मूल्यों और मर्यादा की शिक्षा भी मिलती है।
महंतजी ने अपने शिष्यों को आशीर्वाद दिया और प्रसाद वितरण करते हुए उनके जीवन में शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने रामस्नेही जीवन पद्धति के बारे में बताया और कहा कि रामस्नेही संप्रदाय का मूल उद्देश्य सरल, सात्त्विक और भक्ति भाव से युक्त जीवन जीना है।
भक्ति संगीत और भजन-कीर्तन से गूंज उठा रामद्वारा
गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर भजन-कीर्तन का विशेष आयोजन किया गया। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने पारंपरिक भजन, हरजस और स्तुति गीतों की संगीतमय प्रस्तुति दी, जिससे समूचा वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो गया। भजन मंडली द्वारा गाए गए “गुरु बिना ज्ञान नहीं, राम बिना उद्धार नहीं” जैसे भजनों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु बने रामस्नेही, लिया नया संकल्प
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर कई श्रद्धालु पुरुषों और महिलाओं ने गुरु दीक्षा लेकर रामस्नेही जीवन शैली अपनाने का संकल्प लिया। उन्होंने यह प्रण लिया कि वे अपने जीवन को गुरु के बताए मार्ग पर चलकर व्यतीत करेंगे। इन श्रद्धालुओं ने रामस्नेही संप्रदाय की मर्यादा, सेवा और त्याग पर आधारित शिक्षाओं को अपनाने की शपथ ली।
श्रद्धालु देवीसिंह देवल कूपड़ावास ने बताया भावुक क्षण
इस अवसर पर श्रद्धालु देवी सिंह देवल (ग्राम कूपड़ावास) ने जानकारी देते हुए बताया कि गुरु पूर्णिमा का यह कार्यक्रम अत्यंत आत्मिक और भावनात्मक था। उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ और भौतिकता से भरे जीवन में ऐसे आयोजनों से आत्मा को शांति मिलती है और जीवन की दिशा सही बनती है।
देवी सिंह ने कहा कि महिलाओं द्वारा प्रस्तुत भजनों ने सबको भावविभोर कर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि कई महिलाओं ने अपने जीवन में पहली बार गुरु दीक्षा ली और रामस्नेही बनकर आध्यात्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाया। इससे न केवल उनका जीवन परिवर्तित होगा, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा मिलेगी।
गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व
महंत मुरली दास महाराज ने अपने प्रवचनों में गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा का बखान करते हुए कहा कि गुरु ही जीवन का वास्तविक मार्गदर्शक होता है। जिस प्रकार से दीपक अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार गुरु अज्ञानता को दूर कर जीवन को प्रकाशमय बनाता है। उन्होंने शिष्यों से आह्वान किया कि वे सत्संग, साधना और सेवा के मार्ग पर चलें और सदैव विनम्रता व संयम को अपनाएं।
सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक एकता का संदेश
गुरु पूर्णिमा महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक बनकर सामने आया। यहां किसी जाति, वर्ग या लिंग का भेद नहीं था — सभी ने एक साथ बैठकर भजन सुने, प्रवचन ग्रहण किए और प्रसाद पाया।
कार्यक्रम के अंत में महंत मुरली दास महाराज ने सभी श्रद्धालुओं को आशीर्वचन दिए और उनके जीवन में शांति, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की। उन्होंने गुरु सेवा और सत्संग को जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाने का आग्रह किया।
समारोह का समापन आरती और सामूहिक प्रसाद वितरण के साथ हुआ। श्रद्धालु अपने-अपने गांवों की ओर लौटते समय आंखों में भक्ति और दिल में नए संकल्पों के साथ लौटे।












