राजस्थान

ऐतिहासिक स्थलों के अवलोकन से देसूरी के गौरवशाली इतिहास को जाना

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इतिहास अध्ययन यात्रा के दूसरे चरण में मंदिरों, दरवाजों और बावड़ियों का किया गया अध्ययन

देसूरी |  इतिहास संकलन समिति मरु क्षेत्र, जोधपुर एवं श्री वीर बीकाजी सोलंकी राजपूत संस्थान, देसूरी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इतिहास अध्ययन यात्रा के दूसरे चरण में देसूरी के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का गहन अवलोकन किया गया। इस दौरान अध्ययन दल ने देसूरी के प्राचीन मंदिरों, दरवाजों और बावड़ियों का निरीक्षण कर ऐतिहासिक तथ्यों पर परस्पर विचार-विमर्श करते हुए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।

यह अध्ययन यात्रा इतिहास संकलन समिति मरु क्षेत्र जोधपुर के प्रांत उपाध्यक्ष एवं प्रसिद्ध इतिहासविद् विजयसिंह माली के नेतृत्व में संपन्न हुई। अध्ययन दल में इतिहासज्ञ परबतसिंह सोलंकी, अजयपाल सिंह तथा मांगू सिंह सोलंकी शामिल रहे। दल ने देसूरी के सोलंकी वंश और वीर शिरोमणि बीकाजी सोलंकी से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों का विशेष रूप से अध्ययन किया।

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मंदिरों, दरवाजों और बावड़ियों का अवलोकन

अध्ययन दल ने देसूरी स्थित शैली माता, नामा माता, चौधरा माता और रेली माता के प्राचीन मंदिरों का अवलोकन किया। इसके साथ ही नगर के ऐतिहासिक दरवाजों में नाल दरवाजा और जंगलात दरवाजा तथा प्राचीन बावड़ियों में चंपा बाव, सरदार बाव, पगलिया बाव और तेज बाव का भी गहन अध्ययन किया गया। इन सभी स्थलों के स्थापत्य, ऐतिहासिक महत्व और उनसे जुड़े लोककथाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

वरिष्ठ शिक्षक से इतिहास पर संवाद

इतिहास अध्ययन यात्रा के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए अध्ययन दल ने 85 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक छोटालाल शर्मा से देसूरी के इतिहास को लेकर विशेष चर्चा की। शर्मा ने अपने अनुभव और स्मृतियों के आधार पर देसूरी के गौरवशाली इतिहास के स्वर्णिम पन्नों की जानकारी अध्ययन दल को दी, जिसे रिपोर्ट में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में शामिल किया गया।

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इतिहास को आमजन तक पहुंचाने का उद्देश्य

अध्ययन दल ने बताया कि इतिहास अध्ययन यात्रा का मुख्य उद्देश्य पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर देसूरी के गौरवशाली अतीत को संकलित कर उसे आमजन के समक्ष प्रस्तुत करना है। इस दिशा में यह यात्रा एक महत्वपूर्ण कदम है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी गत वर्ष 14 दिसंबर को इतिहास अध्ययन यात्रा का आयोजन किया गया था।

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सोलंकी वंश का ऐतिहासिक योगदान

इतिहासकारों के अनुसार मेवाड़ के महाराणा रायमल के काल में मादरेचों को पराजित कर सोलंकी वंश ने देसूरी पर आधिपत्य स्थापित किया। ईस्वी सन् 1479 में रायमल सोलंकी देसूरी की पाट गद्दी पर आसीन हुए। देसूरी के सोलंकियों ने मुगल प्रतिरोध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास को और अधिक सशक्त बनाता है।

इतिहास अध्ययन यात्रा के माध्यम से देसूरी की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में सार्थक प्रयास किया जा रहा है।

Khushal Luniya

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