
धर्म का स्वरूप : “यतो धर्मः ततो जयः”
“जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।” महाभारत में अनेक स्थानों पर यह बात कही गई है। धर्म केवल किसी मजहब का नाम नहीं, बल्कि मानवता, सदाचार और श्रेष्ठ आचरण का स्वरूप है।
धर्म का वास्तविक अर्थ
“धर्म” शब्द “धृ” धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना और पोषण करना। अर्थात धर्म वह है जो मनुष्य में मानवता को धारण कराए और उसका विकास करे। लेखक के अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, सिख और ईसाई आदि मजहब हैं, जबकि वास्तविक धर्म मनुष्य का श्रेष्ठ आचरण है।
“आचारः परमो धर्मः”
अर्थात श्रेष्ठ आचरण ही सर्वोच्च धर्म है।
गीता का संदेश
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः”
गीता में स्पष्ट कहा गया है कि अपने मानवीय गुणों और कर्तव्यों का पालन करना ही श्रेष्ठ है। यदि मनुष्य दया, करुणा, क्षमा, धैर्य और संतोष जैसे गुणों को त्याग देता है, तो वह अधर्म के मार्ग पर चला जाता है।
धर्म के मुख्य तत्व
✔ मानवता
धर्म मनुष्य को सच्चा इंसान बनाता है।
✔ सदाचार
श्रेष्ठ व्यवहार और सत्य मार्ग ही धर्म है।
✔ करुणा और क्षमा
दया, त्याग और क्षमा धर्म के मूल गुण हैं।
✔ विजय का मार्ग
धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजय प्राप्त करता है।
धर्म केवल पूजा-पद्धति या मजहब का नाम नहीं है। सत्य, कर्तव्य, सदाचार और मानवता के मार्ग पर चलना ही वास्तविक धर्म है। यही धर्म मनुष्य को इस लोक और परलोक दोनों में विजय प्रदान करता है।
“यतो धर्मः ततो जयः”












