जनता के पैसों पर डाका: कर्मचारी और ठेकेदारों व जनप्रतिनिधियों के गठजोड़ से लग रहा विकास को चूना, कब जागेगी सरकार?

गड्ढों में तब्दील होती सड़कें और ढहती इमारतें बयां कर रही हैं भ्रष्टाचार की कहानी; क्या जनप्रतिनिधियों की चुप्पी इस खेल को दे रही है शह?
विशेष रिपोर्ट- सत्यनारायण सेन गुरला
भीलवाड़ा। देशभर में बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के नाम पर हर साल अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर नतीजा सिर्फ घटिया निर्माण और जानलेवा दुर्घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। ईमानदार टैक्सपेयर्स की गाढ़ी कमाई से दिए जाने वाले टेंडर अब विकास के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबें भरने का जरिया बन चुके हैं। निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही टेबल के नीचे से तय होने वाला ‘कमीशन का खेल’ आज व्यवस्था की नस-नस में समा चुका है।
मौत का सामान बांटते ठेकेदार और मूकदर्शक बने अधिकारी
सड़कें बनने के छह महीने के भीतर उखड़ जाती हैं और पुल उद्घाटन से पहले ही ढह जाते हैं। घटिया निर्माण सामग्री का यह खेल सीधे तौर पर आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ है। इन हादसों में मासूम लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार विभाग और उनके आला अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक न तो कोई जांच होती है और न ही किसी पर गाज गिरती है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधियों (नेताओं) पर उठता है। जनता ने जिन्हें अपनी आवाज उठाने और हक की रक्षा के लिए विधानसभा और संसद में भेजा, वे इस खुले भ्रष्टाचार पर खामोश क्यों हैं? क्या इस चुप्पी के पीछे कोई बड़ी साठगांठ है? क्षेत्र में हो रहे घटिया निर्माण पर स्थानीय विधायकों और सांसदों का संज्ञान न लेना इस आशंका को मजबूत करता है कि ‘कमीशन के इस खेल’ की जड़ें बहुत गहरी हैं।
अब सिर्फ निलंबन नहीं, ‘पेंशन बंद और परमानेंट बैन’ की जरूरत
कानून की ढुलमुल प्रक्रिया के कारण भ्रष्ट तत्वों के हौसले बुलंद हैं। आज समय की मांग है कि व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव किया जाए:
1.पेंशन और नौकरी दोनों खत्म:भ्रष्टाचार या घटिया निर्माण को हरी झंडी देने वाले अधिकारियों को सिर्फ सस्पेंड न किया जाए। उनकी नौकरी तुरंत बर्खास्त हो और बुढ़ापे की लाठी यानी ‘पेंशन’ पर हमेशा के लिए रोक लगे।
ठेकेदारों पर परमानेंट बैन घटिया सामग्री लगाने वाले ठेकेदारों की न सिर्फ जमानत राशि (Security Deposit) जब्त हो, बल्कि उनका लाइसेंस रद्द कर उन्हें हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए।
एसीबी (ACB) की पैनी नजर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को टेंडर प्रक्रिया से लेकर निर्माण पूरा होने तक कड़ी निगरानी रखनी चाहिए
क्या कानून और संविधान में बदलाव का समय आ गया है?
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि मौजूदा प्रशासनिक नियम इस भ्रष्टाचार को रोकने में नाकाम हैं, तो सरकार को सख्त विधायी कदम उठाने होंगे। अधिकारियों को मिलने वाले ‘संवैधानिक संरक्षण’ की समीक्षा होनी चाहिए ताकि जांच के नाम पर सालों-साल मामले न लटके रहें।जनप्रतिनिधियों को अब अपनी नींद से जागना होगा। अगर अब भी इस खूनी खेल पर लगाम नहीं कसी गई, तो जनता का इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा।













