MBMC महासभा: एजेंडा लंबा, जवाबदेही छोटी: क्या महासभा फिर बनेगी औपचारिकता?

मीरा भाईंदर महानगरपालिका की 6 मई की महासभा का एजेंडा जितना विस्तृत है,उतना ही वह शहर की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल भी खड़ा करता है। विकास, स्वास्थ्य,जलापूर्ति,अग्निसुरक्षा, अवैध निर्माण, ट्रैफिक, पार्किंग, स्वच्छता, अतिक्रमण और विभागीय खरीद जैसे विषयों की लंबी सूची पहली नजर में सक्रिय प्रशासन का संकेत देती है, परंतु गहराई से देखें तो यही सूची प्रशासनिक विफलताओं का दस्तावेज भी प्रतीत होती है। शहर की जिन समस्याओं का समाधान वर्षों पहले हो जाना चाहिए था।वे आज भी बार-बार महासभा के एजेंडा में लौट रही हैं।

इसका सीधा अर्थ है कि निर्णय तो हुए,पर क्रियान्वयन अधूरा रहा; योजनाएं बनीं,पर ज़मीन पर असर सीमित रहा।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि हर महासभा में जल रिसाव,अवैध निर्माण, ट्रैफिक जाम, फायर सेफ्टी, कचरा प्रबंधन और नागरिक सुविधाओं की कमियां उठती हैं, तो अब तक समाधान क्यों नहीं हुआ? क्या महासभा केवल चर्चा का मंच बनकर रह गई है,जहां समस्याएं दर्ज होती हैं लेकिन उनका स्थायी निराकरण नहीं होता?विभिन्न विभागों की खरीद, उपकरण,निविदाएं और ठेका प्रस्ताव भी पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। करोड़ों रुपये के प्रस्ताव यदि केवल कागजों पर स्वीकृत होकर रह जाएं,तो जनता को उसका लाभ नहीं, केवल वित्तीय बोझ मिलता है।
ऐसे में यह आवश्यक है कि महासभा केवल प्रस्ताव पारित करने तक सीमित न रहे, बल्कि पुराने प्रस्तावों की प्रगति रिपोर्ट भी सार्वजनिक करे।राजनीतिक दृष्टि से भी यह महासभा महत्वपूर्ण है,क्योंकि विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर अब छिपा नहीं है। जनता अब घोषणाओं से अधिक परिणाम देखना चाहती है।यदि हर बार वही मुद्दे, वही प्रस्ताव और वही आश्वासन दोहराए जाएं, तो महासभा जनहित का मंच कम और प्रशासनिक औपचारिकता अधिक बन जाती है।मीराभाईंदर को अब नई घोषणाओं से ज्यादा पुराने वादों का हिसाब चाहिए।शहर का असली विकास एजेंडा की लंबाई से नहीं, समस्याओं की घटती सूची से मापा जाएगा।














