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पंचकल्याणक महामहोत्सव में संत और संघ का दिव्य समागम, जागी विश्वचेतन

जेठमल राठौड़
रिपोर्टर

जेठमल राठौड़, रिपोर्टर - मुंबई / बाली 

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दीपक जैन


आचार्य समयसागर व सर संघचालक ने दिया विश्व कल्याण का संदेश


नागपुर (तुलसीनगर): अतिशय क्षेत्र श्री आदेश्वर धाम, बाजारगांव के पंचकल्याणक महोत्सव के अंतर्गत नागपुर के तुलसीनगर में चल रहे भव्य आयोजन में भगवान के गर्भकल्याणक (उत्तरार्ध दिवस) आध्यात्मिकता, संस्कार और मानवता का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय बंडा ने जब सरसंघचालक मोहन भागवत को स्मरण कराया कि 16 अप्रैल 2024 को कुंडलपुर में परमपूज्य आचार्य श्री समयसागरजी का आचार्य पद पर पदारोहण हुआ थाजिस अवसर पर उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को गौरवान्वित किया था।16 अप्रैल 2026 पुनः निकट है।

उल्लेखनीय है कि भागवत जी 13 अप्रैल को नागपुर में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव में मुख्य अतिथि थे।इस अवसर पर अपने उदबोधन में आचार्य पदारोहण दिवस के महत्व की अत्यंत सुंदर और गूढ़ व्याख्या प्रस्तुत की।उन्होंने कहा कि यदि हम 13 अप्रैल को देखें, तो उसमें 1 और 3 है। यह “1” व्यक्ति की अपनी सत्ता (मै) का प्रतीक है। और “3” जिसका मुख एक की ओर है; दर्शाता है—मेरा, मेरा परिवार और मेरा समाज।यह अवस्था सीमित है, केंद्रित है, और कहीं न कहीं “शून्यता” की ओर ले जाती है।

उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि वास्तव में यह संसार “शून्य”अंक के समान है।“1” की ओर “3” का मुख रहता है, तो वह 13 बनता है। यह “3” मेरा, मेरा परिवार और मेरा समाज जब “मैं” की ओर झुका रहता है, तब मनुष्य का जीवन “मैं और मेरा” तक सीमित हो जाता है।

उसकी सोच, उसका व्यवहार और उसके निर्णय इसी छोटे दायरे में बंध जाते हैं। बाहर से जीवन भरा हुआ प्रतीत होता है, किंतु भीतर कहीं न कहीं एक शून्यता बनी रहती है।

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लेकिन जब हम 16 अप्रैल को देखते हैं, तो वही “1” और “6” एक नई दिशा में अर्थ प्रदान करते हैं। जब “6” का मुख “1” से हटकर बाहर, संसार की ओर हो जाता है, तब मनुष्य की चेतना विस्तृत हो जाती है। अब वह केवल “मैं, मेरा परिवार, मेरा समाज” तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका भाव “मेरा संपूर्ण संसार” बन जाता है।जब मनुष्य का सुख स्वयं से हटकर संसार की ओर हो जाता है, तब वही जीवन विश्वकल्याण का कारण बन जाता है।यही परिवर्तन सीमित से असीमित की ओर, अहं से विश्व-चेतना की ओर 16 अप्रैल का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश है।

उन्होंने आगे कहा कि भारत को युगों-युगों तक जीवित और अमर बनाए रखने का कार्य संतों की परंपरा ने किया है। जब विश्व आध्यात्मिक ज्ञान से अनभिज्ञ था, तब भारत के ऋषि-मुनि ज्ञान, तप और संस्कार से मानवता का मार्गदर्शन कर रहे थे।आज भी संत-महात्मा समाज को दिशा दे रहे हैं। उनका त्यागमय जीवन और उपदेश गृहस्थ के जीवन को संतुलित और सुखमय बनाने की गारंटी है।सत्संग और संतों का सान्निध्य केवल व्यक्तिगत उत्थान नहीं, बल्कि राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के कल्याण का आधार है। ऐसी संत परंपरा चिरकाल तक जीवित रहे यही भावना भारत को अमरत्व की ओर ले जाती है।

अपने विचारों को उन्होंने दो पंक्तियों में अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया—

“है देह विश्व; आत्मा है भारत माता,

सृष्टि प्रलय पर्यंत अमर यह नाता।”

अर्थात यह देह भले ही विश्व का अंश है, पर हमारी आत्मा भारत माता से जुड़ी है और यह संबंध सृष्टि के अंत तक अमर रहेगा।वास्तव में, भारत को “भारत” बनाने का कार्य संतों ने ही किया है।

इसी क्रम में परमपूज्य आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में मानव जीवन की गहराई को स्पर्श किया। उन्होंने दादा गुरुवर आचार्य ज्ञानसागर जी की पंक्ति को आत्मसात करते हुए कहा—

“मनुजो मानवः भोयात, भारतः प्रति भारतः।”

उन्होंने समझाया कि मनुष्य जन्म से पूर्ण नहीं होता धीरे-धीरे विकसित होता है। जैसे एक बीज अंकुर बनता है, अंकुर पौधा और फिर वृक्ष बनकर दूसरों को छाया, शीतलता और फल देता है।वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन को विकसित करना चाहिए।गर्भ कल्याणक के इस पावन प्रसंग में उन्होंने बताया कि जैसे गर्भ में बीज से जीवन विकसित होता है, वैसे ही संस्कारों से मनुष्य महान बनता है।

उन्होंने कहा कि वे अपने गुरुवर परमपूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज के ज्ञान को ही आगे प्रकाशित कर रहे हैं।प्राचीन परंपराएँ ही जीवन को स्थिरता देती हैं, केवल आधुनिकता यदि प्रकृति के विपरीत हो जाए, तो वह पतन का कारण बनती है।उन्होंने करुणा का संदेश देते हुए कहा कि हमें मूक प्राणियों, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।गोशाला, हथकर्घा और सेवा के अन्य कार्य केवल प्रकल्प नहीं, बल्कि मानवता के जीवंत संस्कार हैं।

विश्वशांति के विषय में उन्होंने स्पष्ट कहा आज के युद्ध अज्ञान और सत्ता संघर्ष के परिणाम हैं। यदि मानव “जियो और जीने दो” को अपनाए, तो शांति अपने आप स्थापित हो जाएगी।हर प्राणी सुख चाहता है इसलिए केवल स्वयं के सुख की नहीं, दूसरों के सुख की भी कामना करनी चाहिए।इस प्रकार संत और संघ दोनों के विचारों का यह संगम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आह्वान बनकर उभरा कि मनुष्य अपने “मैं” से ऊपर उठे और सम्पूर्ण विश्व को अपना माने।

इसी संदर्भ में प्रतिष्ठाचार्य जी ने ‘इंडिया नहीं, भारत बोलो’ का दिव्य आह्वान करते हुए आचार्य श्री विद्यासागरजी की उस भावना का भी स्मरण कराया गया, जिसमें देश का नाम केवल ‘भारत’ हो ऐसा उनका प्रेरणादायी चिंतन था। इस अवसर पर नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया, नागपुर महानगर कार्यवाह रविंद्र बोखारे, भाग संघचालक अरविंद आवड़े, नगर संघचालक जयपाल ढींगरा एवं भाग कार्यवाह महेश झा, पंकज मिश्रा,मनोज बंड की गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम में मोहनजी भागवत का स्वागत , श्री दिगंबर जैन परवार मंदिर ट्रस्ट तथा अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा किया गया ।अध्यक्ष आनंद जैन तथा मंत्री आशीष जैन ने हजारों भक्तों से आह्वान किया गया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पंचकल्याणक महामहोत्सव में उपस्थित होकर धर्मलाभ लें।

Khushal Luniya

Meet Khushal Luniya – A Young Tech Enthusiast, AI Operations Expert, Graphic Designer, and Desk Editor at Luniya Times News. Known for his Brilliance and Creativity, Khushal Luniya has already mastered HTML and CSS. His deep passion for Coding, Artificial Intelligence, and Design is driving him to create impactful Digital Experiences. With a unique blend of technical skill and artistic vision, Khushal Luniya is truly a rising star in the Tech and Media World.

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