रामायण काल में वैदिक संस्कृति का प्रभाव, संध्या-जप और अग्निहोत्र थे धार्मिक जीवन का आधार

पाली। वैदिक परंपराओं और सनातन संस्कृति पर शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए वक्ता घेवरचंद आर्य ने कहा कि Valmiki Ramayana में वर्णित प्रसंग यह प्रमाणित करते हैं कि रामायण काल में संध्या-वंदन, गायत्री जप, अग्निहोत्र, प्राणायाम और वेदाध्ययन धार्मिक जीवन के प्रमुख अंग थे। उन्होंने कहा कि उस समय धर्म का आधार आचार, यज्ञ, तप और वेदज्ञान था।
उन्होंने बताया कि Rama और लक्ष्मण द्वारा प्रतिदिन संध्या-वंदन एवं गायत्री जप करने के अनेक उल्लेख रामायण में मिलते हैं। बालकाण्ड के अनुसार महर्षि Vishvamitra प्रभातकाल में श्रीराम को जगाते हुए कहते हैं — “कौशल्या सुप्रजा राम, पूर्वा संध्या प्रवर्तते”, अर्थात हे राम, प्रातःकालीन संध्या का समय हो गया है। इसके बाद राम और लक्ष्मण स्नान कर जप एवं अग्निहोत्र करते हैं।
वक्ता ने कहा कि अयोध्याकाण्ड में माता Kausalya के प्राणायाम और अग्निहोत्र का उल्लेख भी मिलता है। एक प्रसंग में वे नेत्र बंद कर परमात्मा का ध्यान करती हुई वर्णित हैं, वहीं दूसरे प्रसंग में वे वैदिक मंत्रों के साथ अग्नि में आहुति देती दिखाई देती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय स्त्रियाँ भी वैदिक उपासना-पद्धति में सक्रिय भागीदारी निभाती थीं।

उन्होंने कहा कि सुंदरकाण्ड में Hanuman द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि सीता जीवित होंगी तो वे संध्या के समय नदी तट पर अवश्य आएँगी। इससे यह संकेत मिलता है कि संध्या-वंदन तत्कालीन समाज में सामान्य धार्मिक परंपरा थी।
घेवरचंद आर्य ने बताया कि रामायण में श्रीराम को वेद-वेदांगों का ज्ञाता तथा धर्मपालक कहा गया है। वहीं Ravana को भी वेदविद्या में पारंगत बताया गया, लेकिन उसके अधर्मपूर्ण आचरण के कारण उसे पापी माना गया। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में “आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः” अर्थात दुराचारी व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते — यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है।
वक्ता के अनुसार Valmiki Ramayana केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि वैदिक जीवनशैली, कर्तव्यपरायणता और सदाचार का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो आज भी समाज को नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है।












