अक्षय तृतीया पर जैन धर्म में विशेष महत्व, वर्षीतप पारणा और आहार दान की परंपरा पर जोर

- पाली/भीलवाड़ा | 20 अप्रैल 2026
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर जैन समाज में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया। जहां आम जनमानस में यह पर्व शुभ कार्यों और नए आरंभ के लिए जाना जाता है, वहीं जैन धर्म में यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के वर्षीतप पारणा से जुड़ा हुआ है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान ऋषभदेव ने 400 दिनों तक निराहार तप किया था, जिसके बाद उन्होंने हस्तिनापुर में राजा सोमप्रभ के पुत्र श्रेयांस कुमार से इक्षुरस (गन्ने का रस) ग्रहण कर उपवास का पारणा किया। इसी घटना को आहार दान की परंपरा की शुरुआत माना जाता है।
बताया गया कि इस दिन को “अक्षय” इसलिए कहा जाता है क्योंकि श्रेयांस कुमार द्वारा अर्पित इक्षुरस की धारा अक्षय बनी रही और देवताओं ने इसे प्रथम सुपात्र दान के रूप में स्वीकार किया।

जैन धर्मावलंबियों के लिए यह पर्व तप, जप और दान की प्रेरणा का प्रतीक है। विशेष रूप से वर्षीतप करने वाले साधक इस दिन इक्षुरस से पारणा कर अपनी 13 महीने की कठोर साधना पूर्ण करते हैं।
इसके साथ ही इस दिन आहार दान का विशेष महत्व रहता है और मंदिरों में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का अभिषेक भी गन्ने के रस से किया जाता है, जो इस ऐतिहासिक घटना का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक प्रवचनों में बताया गया कि भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को आत्मनिर्भर बनने का संदेश देते हुए कृषि, लेखन और सामाजिक व्यवस्थाओं की शुरुआत की थी।
वर्तमान समय में जैन समाज में तप, जप और दान की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु वर्षीतप जैसे कठिन व्रत अपना रहे हैं। हालांकि, बढ़ती संख्या के कारण पारणोत्सव के आयोजन बड़े स्तर पर होने लगे हैं, जहां कभी-कभी व्यवस्थाओं और आयोजन से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आती हैं।
समाजजनों ने इस अवसर पर तपस्वियों के प्रति अनुमोदना व्यक्त करते हुए उनके त्याग और साधना को प्रेरणादायक बताया तथा सभी के सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना की।
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