
पाली में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रस्तोता घेवरचन्द आर्य ने “त्रिविध दान” विषय पर विस्तृत विचार व्यक्त किए। उन्होंने भारतीय परंपरा में दान की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि प्राचीन काल से ही देश में महाराज रंतिदेव, धर्मराज युधिष्ठिर, सम्राट हर्षवर्धन, सम्राट अशोक और भामाशाह जैसे महान दानी हुए हैं। वर्तमान समय में भी सेठ घनश्याम दास बिड़ला और रतन टाटा जैसे व्यक्तित्व इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि दान देना प्रत्येक व्यक्ति का धार्मिक और सामाजिक कर्तव्य है। समाज में अभावग्रस्त, शारीरिक रूप से अक्षम तथा सेवा कार्यों में लगे लोगों की सहायता करना गृहस्थों का धर्म है।
प्रस्तोता ने श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर दान के तीन प्रकार बताए—सात्त्विक, राजसी और तामसी। उन्होंने बताया कि सात्त्विक दान वह है, जो बिना किसी स्वार्थ और प्रत्युपकार की अपेक्षा के, योग्य समय, स्थान और पात्र को दिया जाता है, जिसे सर्वोत्तम माना गया है।
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राजसी दान के बारे में उन्होंने कहा कि यह दान किसी लाभ या फल की इच्छा से दिया जाता है, जबकि तामसी दान वह है जो अनुचित समय, स्थान या अयोग्य व्यक्ति को अपमान या तिरस्कार के साथ दिया जाता है, जिसका कोई विशेष सामाजिक या धार्मिक महत्व नहीं होता।
कार्यक्रम में दान के पाँच दोषों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें पात्र का अनादर, समय पर दान न देना, अनिच्छा से देना, कठोर वचन कहना और बाद में पछताना शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दान देते समय इन दोषों से बचना आवश्यक है।
अंत में वेदों के संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को अधिक से अधिक धन अर्जित कर उसे उदारता से समाज के कल्याण में लगाना चाहिए। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने इस विचार को समाज में अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।












