भावनाशून्य भीड़ में जागी संवेदना: भूलेश्वर कबूतरखाने में दो कबूतरों की मुक्ति ने दिलों को झकझोरा

- मुंबई।
शहर के व्यस्ततम इलाकों में से एक भूलेश्वर कबूतरखाना – जहां रोज़ाना सैकड़ों लोग आकर पक्षियों को दाना डालते हैं।
यह दृश्य वर्षों से चलता आ रहा हैं, एक धार्मिक परंपरा के रूप में, एक आदत के रूप में। लेकिन रविवार की सुबह इस भीड़ में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने “भावनाशून्यता की मशीनवत परंपरा” पर सवाल खड़े कर दिए।
पत्रकार जीवदया प्रेमी सुरेश पाड़ीव ने कबूतरखाने में दो कबूतरों को धागों में उलझा देखा — महीनों से जकड़े हुए, उड़ने में असमर्थ, तड़पते हुए। रोज़ सैकड़ों आंखों ने इन्हें देखा, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। मगर सुरेश पाड़ीव ने जैसे ही यह मंजर देखा, वे चुप नहीं रह सके। उन्होंने न केवल उन कबूतरों को अपने हाथों में उठाया, बल्कि उन्हें मुक्त करने के लिए तत्पर हो गए।
उनकी इस जीवदया भावना में समाजसेवी और भामाशाह फूलचंद पुरोहित ने भी सहयोग किया, जो वर्षों से गायों, हिरणों और अन्य जीवों की सेवा में समर्पित हैं। दोनों ने मिलकर इन कबूतरों को धागों से आज़ाद किया। यह दृश्य देखकर अन्य लोग भी रुक गए, चौंके, और एक सवाल उठाया – ”हम रोज़ दाना तो डालते हैं, लेकिन क्या कभी किसी की हालत पर ध्यान देते हैं?”

इस चर्चा में लोगों ने यह स्वीकारा कि हम शहरों में मशीन जैसे हो गए हैं – हर रोज़ एक ही रूटीन, वही दाना डालना, वही पूजा, लेकिन बिना किसी जीवंत संवेदना के। भावनाओं का स्थान अब आदतों ने ले लिया हैं। जो काम आत्मा से होना चाहिए, वह अब केवल शरीर से हो रहा हैं। ऐसे में सुरेश पाड़ीव और फूलचंद पुरोहित, उमेदसिंह पुनाड़िया, जीतेन्द्र सिंह राठौड़ जैसे जागरूक लोग हमें याद दिलाते हैं कि जीव सेवा केवल कर्म नहीं, करुणा हैं।
इस घटना ने हमें फिर से चेताया हैं कि श्रद्धा के साथ सजगता भी जरूरी हैं। यह प्रेरणा देता हैं कि दाना डालने से पहले देखना सीखें, महसूस करना सीखे, और ज़रूरतमंद की पुकार को सुनना सीखे। नहीं तो हम अपने धर्म और संवेदनाओं दोनों को खो देंगे।
एक जीव की पीड़ा अगर आपको भीतर तक नहीं छूती, तो श्रद्धा केवल परंपरा बन जाती है। और परंपरा से पहले ज़रूरी हैं – जीवित चेतना।



















