
सत्यनारायण सेन, गुरलां @ भीलवाड़ा। राजसमंद और भीलवाड़ा जिले की सरहद पर, रायपुर उपखंड के अंतर्गत स्थित बाड़िया गांव में स्थित बाड़िया माता का चमत्कारिक मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां परिक्रमा लगाने और माता के दर्शन करने से लकवा सहित कई असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और माता की पूजा-अर्चना, आरती एवं सेवा में शामिल होते हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था और सुविधाएं
पालरा निवासी ओमप्रकाश सेन बताते हैं कि यह मंदिर रायपुर से 10 किमी, कोशिथल से 7 किमी और नान्दसा जागीर से 3 किमी की दूरी पर स्थित है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विभिन्न समाजों द्वारा सराय और विश्राम गृह बनवाए गए हैं, जहां आगंतुक निशुल्क ठहर सकते हैं। मंदिर परिसर में भोजन बनाने के लिए भी अलग से कमरे उपलब्ध हैं।
शनिवार-रविवार और विशेषकर नवरात्रि में यहां भारी भीड़ उमड़ती है। भक्तजन पैदल यात्राएं कर माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।

मंदिर की मान्यता: परिक्रमा से मिलता है स्वास्थ्य लाभ
ओमप्रकाश सेन के अनुसार, यदि किसी महिला या पुरुष को लकवा जैसी बीमारी हो जाती है तो उसे यहां लाकर माता की परिक्रमा करवाई जाती है। कई पीड़ित मंदिर में 10 से 30 दिन तक रहते हैं और परिक्रमा के बाद स्वस्थ होकर लौटने के अनेक उदाहरण सामने आ चुके हैं।
इतिहास: चमत्कार से जुड़ा प्रसंग
मंदिर के इतिहास को लेकर कहा जाता है कि विक्रम संवत् 1985 के श्रावण-भाद्रपद मास में देवी मां का प्रिय अस्त्र सुदर्शन चक्र यहां प्रकट हुआ था। उस समय सगसजी महाराज ने माता को बलि, मदिरा और मांस का भोग न लेने का संकल्प दिलवाया।
इसी दौरान गाँव के एक निर्धन परिवार की पुत्री जम्मु देवी लकवा रोग से पीड़ित थीं। माता ने उनके पिता किशना जी गुर्जर (खटाणा) को आकाशवाणी के माध्यम से निर्देश दिया और चमत्कार स्वरूप जम्मु देवी का लकवा ठीक हो गया। इसके बाद गांववासियों की उपस्थिति में उसी स्थान पर माता की स्थापना हुई।
किशना जी ने 15 वर्षों तक सेवा-पूजा की। उनके स्वर्गवास के बाद पुत्र जोधराज गुर्जर को माता ने दिव्य दर्शन दिए और मंदिर निर्माण का आदेश दिया। विक्रम संवत् 2026 से 2028 (सन् 1969-71) तक मंदिर और मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई गई।
वर्तमान व्यवस्था
आज भी गुर्जर परिवार की संतति मां की सेवा कर रही है। वि.सं. 2063 (सन् 2006) में जोधराज जी के स्वर्ग सिधारने के बाद उनके पुत्र भेरूलाल, मांगीलाल, दीपक, पारस और सुरेश पूजा-अर्चना और भक्ति का कार्य संभाल रहे हैं। मंदिर परिसर में जोधा भोपाजी की मूर्ति भी स्थापित है।
पास ही स्थित बाड़िया श्याम मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
गांव का नाम भी बदला
मान्यता है कि पहले इस गांव का नाम कुम्हारों का वाड़िया था। लेकिन देवी माता के चमत्कारों के चलते ही समय के साथ इसे बाड़िया माता जी के नाम से पुकारा जाने लगा।
बाड़िया माता मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि लोगों की उम्मीदों का भी केंद्र बन चुका है। यहां आने वाले भक्त मानते हैं कि माता की परिक्रमा और भक्ति से जीवन की सबसे कठिन बीमारियां भी दूर हो सकती हैं।














