धर्म की आड़ में बजरंग दल की दादागिरी? कवरेज के दौरान पत्रकार पर हमला

जेठमल बी. राठौड़, भायंदर (पश्चिम)
मीरा-भाईंदर में पत्रकार केतन बारिया पर हुआ हमला केवल एक व्यक्ति पर वार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। जिस व्यवस्था का संतुलन स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता पर टिका है, उसी को निशाना बनाया जाना गंभीर चिंता का विषय है।
यह घटना उस बढ़ती असहिष्णुता का प्रतीक है, जहाँ सच लिखना और सवाल पूछना जोखिम भरा होता जा रहा है। एक ओर पत्रकारिता समाज को जागरूक करने, सत्ता से जवाबदेही तय करने और आमजन की आवाज़ बनने का काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर धमकियाँ, फर्जी मुकदमे, ट्रोलिंग और शारीरिक हमले इस पेशे को भय के दायरे में धकेल रहे हैं।
स्थिति का सकारात्मक पहलू यह है कि ऐसे मामलों में पत्रकारों की एकजुटता और जनसमर्थन अब भी कायम है, जो उम्मीद जगाता है। लेकिन नकारात्मक सच्चाई यह है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण, डिजिटल नफरत और कानून के कमजोर क्रियान्वयन ने हमलावरों के हौसले बढ़ा दिए हैं।

जनहित में अब यह आवश्यक हो गया है कि सरकारें सख्त कानून बनाकर उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। मीडिया संस्थानों को भी अपने पत्रकारों को सुरक्षित कार्य वातावरण देना होगा, और समाज को सच के साथ खड़ा होना होगा।
क्योंकि अगर पत्रकार डर गया, तो सच दब जाएगा—और जब सच दबेगा, तब लोकतंत्र कमजोर पड़ेगा।
इस कायराना हमले का कड़ा विरोध करते हुए घायल पत्रकार के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जाती है, साथ ही प्रशासन से ठोस कार्रवाई की मांग की जाती है।














